P07 || श्री सद्गुरु की सार शिक्षा का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी || संतमत सत्संग की प्रातःकालीन स्तुति-प्रार्थना

महर्षि मेँहीँ पदावली / 07

     प्रभु प्रेमियों ! संतवाणी अर्थ सहित में आज हम लोग जानेंगे- संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज की भारती (हिंदी) पुस्तक "महर्षि मेँहीँ पदावली" जो हम संतमतानुयाइयों के लिए गुरु-गीता के समान अनमोल कृति है। इस कृति के 7वें पद्य  "श्री सद्गुरु की सार शिक्षा....''  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी के  बारे में। जिसे पूज्यपाद लालदास जी महाराज नेे किया है।

इस पद्य को संतमत सत्संग के प्रातः कालीन स्तुति-विनती के साथ में गाते हैं। इसके पहले वाले गद्य  "जो परम तत्व आदि अन्त्त.." को शब्दार्थ सहित पढ़ने के लिए  👉 यहाँ दवाएँ.

संतमत सत्संग हाल
महर्षि मेंहीं आश्रम हाल

श्री सद्गुरू की सार शिक्षा की विशेषता क्या है? 

     प्रभु प्रेमियों  !  इस भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन, पद्य, वाणी, छंद)  में बताया गया है कि--  गुरु महाराज के मुख्य शिक्षाओं को हमेशा याद रखना चाहिए। जिससे कि उनके आज्ञापालन में किसी प्रकार का कोई त्रुटि ना रह जाए । साधक जब सुई में धागा पिरोता है, तब उसमें छोटा सा भी गांठ या किसी भी प्रकार का अर्चन रहने से सुई में जिस तरह धागा नहीं पिरोया जा सकता; उसी तरह से गुरु आज्ञा पालन में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी होने से, कमी होने से साधक की आध्यात्मिक उन्नति साधना में सफलता नहीं हो सकती है, इसलिए गुरु भक्ति अत्यंत आवश्यक है और सभी लोग अपने संत सद्गुरु की आज्ञा का पालन कर सकें, इसके लिए उनके सार शिक्षाओं को समझना अत्यंत आवश्यक है. सद्गुरु की सार शिक्षा का महत्व इसी से समझा जा सकता है। इत्यादि बातें । 
 
     सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज जी  कहते हैं- "सद्गुरु की मुख्य शिक्षाओं को सदा स्मरण रखना चाहिए और अत्यंत अटल श्रद्धा तथा प्रेम से सद्गुरु की भक्ति करनी चाहिए। lmportance of education , "श्री सद्गुरु की सार शिक्षा.."  इस पद को समझाते हुए पूज्यपाद लालदास जी महाराज ने श्री "सद्गुरु की सार शिक्षा" नामक एक पूरी पुस्तक ही लिख डाली है। उस में विस्तार से "सद्गुरु की सार- शिक्षाओं" के बारे में बताया गया है. लेकिन यहां सामान्य रूप से इस पद्य का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया है। आइये इसे पढ़े-


श्री सद्गुरू की सार शिक्षा

।। मूल पद्य 07 ।।

श्री सद्गुरू की सार शिक्षा , याद रखनी चाहिये । अति अटल श्रद्धा प्रेम से , गुरु - भक्ति करनी चाहिये ॥१ ॥ 
मृग - वारि सम सब ही प्रपञ्चन्ह , विषय सब दुख रूप हैं । निज सुरत को इनसे हटा , प्रभु में लगाना चाहिये ॥२ ॥ 
अव्यक्त व्यापक व्याप्य पर जो , राजते सबके परे । उस अज अनादि अनन्त प्रभु में , प्रेम करना चाहिये ॥३ ॥ 
जीवात्म प्रभु का अंश है , जस अंश नभ को देखिये । घट मठ प्रपंचन्ह जब मिटैं , नहिं अंश कहना चाहिये ।।४ ॥ 
ये प्रकृति द्वय उत्पत्ति - लय , होवें प्रभू की मौज से । ये अजा अनाद्या स्वयं हैं , हरगिज न कहना चाहिये ॥५ ॥ 
आवागमन सम दुःख दूजा , है नहीं जग में कोई । इसके निवारण के लिये , प्रभु - भक्ति करनी चाहिये ॥६ ॥ 
जितने मनुष तन धारि हैं , प्रभु - भक्ति कर सकते सभी । अन्तर व बाहर भक्ति कर , घट - पट हटाना चाहिये ॥७ ॥ 
गुरु - जाप मानस ध्यान मानस , कीजिये दृढ़ साधकर । इनका प्रथम अभ्यास कर , स्रुत शुद्ध करना चाहिये ॥८ ॥ 
घट तम प्रकाश व शब्द पट त्रय , जीव पर हैं छा रहे । कर दृष्टि अरु ध्वनि योग साधन , ये हटाना चाहिये ॥९ ॥ 
इनके हटे माया हटेगी , प्रभु से होगी एकता । फिर द्वैतता नहिं कुछ रहेगी , अस मनन दृढ़ चाहिये ॥१० ॥ 
पाखण्ड अरुऽहंकार तजि , निष्कपट हो अरु दीन हो । सब कुछ समर्पण कर गुरू की , सेव करनी चाहिये ॥११ ॥ 
सत्संग नित अरु ध्यान नित , रहिये करत संलग्न हो । व्यभिचार चोरी नशा हिंसा , झूठ तजना चाहिये ॥१२ ॥ 
सब सन्तमत सिद्धान्त ये , सब सन्त दृढ़ हैं कर दिये । इन अमल थिर सिद्धान्त को , दृढ़ याद रखना चाहिये ॥१३ ॥ 
यह सार है सिद्धान्त सबका , सत्य गुरु को सेवना । ' मेँहीँ ' न हो कुछ यहि बिना , गुरु सेव करनी चाहिये ॥१४ ॥

शब्दार्थ

पूज्य पाद लाल दास जी महाराज
शब्दार्थकार-- बाबा लालदास
     श्री = श्रीयुत् , श्रीमत् , एक आदरसूचक शब्द जो आदरणीय व्यक्ति के नाम के पहले जोड़ा जाता है । ( श्री - धन , यश , शोभा , प्रतिष्टा , गौरव , महिमा , सौंदर्य ।  ' सद्गुरु ' संबंध - सूचक शब्द है ।) सार = मुख्य , उत्तम , श्रेष्ठ , सच्चा । याद ( फा ० ) = स्मरण स्मृति । श्रद्धा = किसी के प्रति विश्वास , आदर , प्रेम और पूज्य भाव । अटल विश्वास = गुरु - वाक्य , सच्छास्त्र और सद्विचार - तीनों का मेल होने पर होनेवाला अटल विश्वास । मृग - वारि = मृगजल , रेगिस्तान में ज्येष्ठ - वैशाख के दिनों में कड़ी धूप के कारण दूर मालूम पड़नेवाला जलाशय , जिस ओर हिरन अपनी प्यास बुझाने के लिए दौड़ता है । प्रपंच = झूठा , भ्रम । दुःखरूप = दुःख का साक्षात् रूप , दुःख का कारण , दुःख देनेवाला ।  अव्यक्त = जो इन्द्रियों के ग्रहण में नहीं आए । व्यापक = सर्वव्यापक , सबमें फैला हुआ समस्त प्रकृति - मंडलों में फैला हुआ परमात्म - अंश । व्याप्य = जिसमें कुछ फैलकर रह रहे हो , समस्त प्रकृति - मंडल जिनमें परमात्म - अंश व्यापक है । व्याप्य पर = प्रकृति - मंडलों के बाहर , सर्वव्यापकता के परे । राजते = राजता है , विद्यमान है , स्थित है , शोभित है ।  परे = बाहर , ऊपर । अनादि ( न + आदि ) = आदि - रहित । अंश = हिस्सा , अवयव , भाग । मठ = मकान , घर । प्रपंच = आवरण । द्वय = दोनों । लय = विलय , मिलना , लीन होना, नाश । प्रकृति द्वय = दोनों प्रकृतियाँ - जड़ प्रकृति और चेतन प्रकृति । मौज ( अ० स्त्री ० ) = तरंग , लहर , उत्साह , उमंग , आनन्द , ईक्षण , संकल्प , शब्द - धार , आदिशब्द, सारशब्द । अजा ( अज का स्त्रीलिंग रूप ) = अजन्मा । अनाद्या ( अनादि का स्त्रीलिंग रूप ) = आदि - रहित , अपूर्व , जिसके पूर्व और कुछ नहीं हो । हरगिज ( फा ० ) = कदा, कभी । आवागमन = आना - जाना , जन्म - मरण । निवारण = हटाना , रोकना , दूर करना । तनधारि = शरीरधारी । अन्तर-भक्ति = अन्तर्मुख कर देनेवाली भक्ति , सूक्ष्म एवं सूक्ष्मातिसूक्ष्म उपासना । ( फा ० ) = और । बाहरी भक्ति =  सत्संग , गुरु - सेवा और स्थूल उपासन । घट - पट = शरीर के अन्दर जीवात्मा पर पड़े हुए आवरण - अंधकार , प्रकाश और शब्द। दृढ़ साधकर = मजबूती अपनाकर । त्रय = तीनों । स्रुत =  सुरत , चेतनवृत्ति । तम = अंधकार ।  पट = आवरण । हैं छा रहे = छा रहे हैं , फैले हुए हैं , पड़े हुए हैं । घट = शरीर । ध्वनियोग = शब्दयोग । माया = जड़ और चेतन प्रकृतिरूपी भ्रम । एकता = एक होने भाव । द्वैतता = द्वैत भाव , अलगाव , भिन्नता । मनन = विचार । पाखंड = ढोंग , आडम्बर, दिखावे का आचरण । अहंकार = घमंड । निष्कपट ( निः + कपट ) = कपट - रहित , छल - रहित,  सच्चा , सरल । दीन = नम्र , अहंकार - रहित । संलग्न हो = अच्छी तरह लगा हुआ रहकर, तत्परतापूर्वक , मुस्तैदी के साथ । अमल ( अमल ) = दोष - रहित , त्रुटि - विहीन, शुद्ध । सिद्धांत ( सिद्ध + अंत ) = वह ज्ञान जो विचार और अनुभव से अन्ततः पूर्णरूप सत्य सिद्ध हो गया हो , निश्चित मत । 






भावार्थ -
टीकाकार- पूज्यपाद छोटेलाल दास जी महाराज, संतनगर, बरारी, भागलपुर-3, बिहार भारत।
भावार्थकार- संतजी 
 सद्गुरु की मुख्य शिक्षाओं को सदा स्मरण रखना चाहिए और अत अटल श्रद्धा तथा प्रेम से सद्गुरु की भक्ति करनी चाहिए ॥१॥

      मृगजल ( मरुभूमि में सूर्य की तीक्ष्ण किरणों के आधार पर दूर में प्रतीत होनेवाले जलाशय ) की भाँति सबकुछ ( सारा संसार ) झूठा है और पंच विषयों के सुख परिणाम में दु ख देनेवाले हैं । संसार के पंच विषयों से अपनी सुरत को हटाकर ईश्वर - भक्ति में लगाना । चाहिए ॥२ ॥ 

     जो इन्द्रियों के ग्रहण में नहीं आनेयोग्य , सर्वव्यापक ( समस्त प्रकृति - मंडलों में अंश - रूप से फैला हुआ ) और व्याप्य से परे ( समस्त प्रकृति - मंडलों से बाहर , सर्वव्यापकता के परे ) अपरिमित रूप से विद्यमान है , उस अजन्मा और आदि - अन्त - रहित परमात्मा से प्रेम करना चाहिये ॥३ ॥ 

     जैसे घटाकाश ( घड़े के अन्दर का आकाश ) और मठाकाश ( घर के अन्दर का आकाश ) महदाकाश ( बड़े आकाश , आवरण - रहित विस्तृत आकाश ) के अटूट अंश हैं , उसी तरह जीवात्मा परमात्मा का अटूट अंश है । जैसे घट - मठरूप आवरणों के हट जाने पर घटाकाश और मठाकाश महदाकाश के अंश नहीं कहलाकर महदाकाश ही कहलाने लगते हैं , उसी तरह शरीर - रूप आवरणों के हट जाने पर जीवात्मा भी परमात्मा का अंश न कहलाकर परमात्मा ही कहलाने लगता है ।।४ ।। 

     जड़ और चेतन - ये दोनों प्रकृतियाँ परम प्रभु परमात्मा की मौज ( आदिशब्द ) से उत्पत्ति और लय को प्राप्त होती रहती हैं । ये दोनों प्रकृतियाँ उत्पत्ति - विहीन , अनाद्या ( जिनके पूर्व और कुछ नहीं हो ) और अपने - आपमें स्वतंत्र हैं - ऐसा कदापि नहीं मानना चाहिए ।।५ ॥ 

     जनमने और मरने के दुःख के समान संसार में और कोई दुःख नहीं है अथवा जनमने और मरने के समान दुःख का सबसे बड़ा कारण दूसरा कुछ नहीं है । जनमने - मरने के चक्र को रोकने के लिए परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए ।।६ ।। 

     मनुष्य - शरीर धारण किये हुए जितने प्राणी हैं , सभी परमात्मा को भक्ति करने के अधिकारी हैं । अन्तर और बाहर की भक्ति करके शरीर के अन्दर जीवात्मा पर पड़े हुए आवरणों को हटाना चाहिए ।।७ ।। 

     गुरु - मंत्र का मानस जप और गुरु के देखे हुए स्थूल रूप का मानस ध्यान मजबूती अपनाकर कीजिए । पहले मानस जप और मानस ध्यान का अभ्यास करके अपनी सुरत को निर्मल कर लेना चाहिए ॥ ८ ॥

     अंधकार , प्रकाश और शब्द - ये तीन आवरण शरीर के अन्दर जीवात्मा पर छाये हुए हैं । दृष्टियोग और शब्दयोग के साधन करके इन आवरणों को हटाना चाहिए ॥९ ॥ 

     इन आवरणों के हट जाने पर माया हट जाएगी और जीवात्मा को परमात्मा से एकता हो जाएगी । फिर जीवात्मा और परमात्मा के बीच कुछ भी द्वैतता ( अलगाव - भेद - अन्तर ) नहीं रह जायगी - ऐसा मजबूत विचार सदा अपनाये रखना चाहिए अर्थात् सदा ऐसा अटल विश्वास रखना चाहिए ॥१० ॥ 

     पाखंड ( दिखावे के आचरण ) और अहंकार ( घमंड ) को छोड़कर , कपट - रहित और नम्र होकर तथा सब कुछ के समर्पण भाव से गुरु की भक्ति करनी चाहिये ॥११॥ 

     प्रतिदिन पूरी संलग्नता के साथ सत्संग और ध्यानाभ्यास करते रहिए । इसके लिए व्यभिचार ( पुरुष के लिए परस्त्रीगमन और सी के लिए परपुरुष - गमन ) , चोरी , नशा - सेवन , हिंसा ( जीवों को किसी भी प्रकार से कष्ट पहुँचाना ) और झूठ ( असत्य भाषण ) का परित्याग करना चाहिए ।।१२ ।। 

    ये सभी सन्तमत - सिद्धान्त सभी सन्तों ने निश्चित कर दिये हैं । इन त्रुटि - विहीन और सत्य सिद्धान्तों को मजबूती के साथ याद रखना चाहिए अर्थात् मजबूती के साथ अपनाना चाहिए ।।१३ ।।

      सन्त सद्गुरु की सेवा करना यह सभी सिद्धान्तों का सार है । सद्गुरु महर्षि में ही परमहंसजी महाराज कहते हैं कि गुरु - सेवा किये बिना कुछ भी आध्यात्मिक लाभ नहीं होगा । इसलिए अनिवार्य रूप से गुरु की सेवा करनी चाहिए ॥१४ ॥


 टिप्पणी - 

बाबा लालदास जी महाराज
टिप्पणीकार- बाबा लालदास जी

     १. घड़े के अन्दर का आकाश घटाकाश , घर के अन्दर का आकाश मठाकाश और जो सुविस्तृत आकाश किसी आवरण में नहीं है , वह महाकाश या महदाकाश कहलाता है । घटाकाश और मठाकाश महदाकाश के अट अंश हैं । ऐसा नहीं समझना चाहिए कि घट - मठरूप आवरणों के कारण घटाकाश और मठाकाश महदाकाश से अलग हो जाते हैं । ( आकाश तो घट - मठरूप अवारणों में भी व्यापक होता है । ) जब घट - मठरूप आवरण नष्ट हो जाते हैं , तब घटाकाश और मठाकाश महदाकाश के अंश नहीं कहलाकर महदाकाश ही कहलाने लगते हैं । इसी तरह शरीर - स्थित आत्मतत्त्व जीवात्मा कहलाता है , जो परमात्मा का अटूट अंश है ; परन्तु शरीरों के नष्ट हो जाने पर वह आत्मतत्त्व परमात्मा का अंश ( जीवात्मा ) न कहलाकर परमात्मा ही कहलाने लगता है । 

     २. जड़ और चेतन - दोनों प्रकृतियाँ परमात्मा से स्फुटित आदिनाद से उत्पन्न होती हैं और जब इन दोनों प्रकृतियों से आदिनादं निकल जाता है , तब ये दोनों प्रकृतियाँ नष्ट हो जाती हैं । वेदान्त मानता है कि जड़ और चेतन - दोनों प्रकृतियों का मूलकारण ब्रह्म ( परमात्मा ) ही है । दोनों प्रकृतियाँ ब्रह्म के अधीन हैं - अपने - आपमें स्वतंत्र नहीं । प्रकृति देश - काल में नहीं उपजी है ; प्रकृति के बनने पर ही देश - काल बने हैं । प्रकृति कहाँ ( किस स्थान पर ) और कब ( किस समय ) उत्पन्न हुई - यह नहीं बताया जा सकता , इसलिए प्रकृति देश - काल की दृष्टि से अनादि है । प्रकृति के पहले से ब्रह्म है , अतएव उत्पत्ति की दृष्टि से प्रकृति अनादि नहीं , सादि ( आदि - सहित , जिसके पूर्व कुछ हो ) है । यहाँ ' अनादि ' का अर्थ है जिसके पूर्व दूसरा कुछ नहीं हो । सांख्य - दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कपिल सृष्टि के मूल में दो तत्त्वों को अनादि ( अपूर्व और उत्पत्ति - रहित ) मानते हैं , वे दो तत्व हैं - पुरुष और प्रकृति । उनको मान्यता है कि पुरुष और प्रकृति से श्रेष्ठ तथा पहले का तीसरा कोई तत्त्व नहीं है । ये दोनों किसी से उत्पन्न नहीं हुए हैं , एक - दूसरे से भिन्न और अपने आपमें स्वतंत्र हैं । पुरुष अनेक , चेतन , साक्षी , निर्गुण , सर्वव्यापक , निष्क्रिय , निर्विकार और नित्य ( अविनाशी ) है । दूसरी ओर प्रकृति जड़ और त्रयगुणस्वरूप है । यह भी नित्य है ; परन्तु पुरुष की तरह नहीं । पुरुष सदा एकरस रहता है , कभी बदलता नहीं लेकिन प्रकृति कार्यरूप में परिणत होनेवाली है । पुरुप से किसी पदार्थ की उत्पत्ति नहीं होती । प्रकृति पुरुष के सान्निध्य में जगत् की रचना करती है । महर्षि कपिल जिनको पुरुष और प्रकृति कहते हैं , उनको वेदान्त क्रमश : चेतन प्रकृति और जड़ प्रकृति मानता है और इन दोनों से श्रेष्ठ तथा पहले का परब्रह्म को स्वीकार करता है । 

     ३. विषयों के चिन्तन - सेवन से मन मलिन हो जाता है । मानस जप और मानस ध्यान पूर्ण होने पर मन की मलिनता दूर हो जाती है । 
     ४. जन्म लेने पर ही जीव त्रय ताप भोगता है । यदि जन्म ही नहीं हो , तो त्रयताप कौन भोगे ; और यह भी सत्य है कि जो , जन्म लेता है , वही मरता है । इसीलिए कहा जाता है कि जन्म - मरण ही दुःख पाने का सबसे बड़ा कारण है । फिर यह भी सत्य है कि जनमने - मरने के समय भी असह्य कष्ट होता है । ∆

( पदावली के सभी छंदों के बारे में विशेष जानकारी के लिए पढ़ें-- LS14 महर्षि मँहीँ-पदावली की छन्द-योजना ) 




आगे हैं--
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सन्तमत की परिभाषा

१. शान्ति स्थिरता वा निश्चलता को कहते हैं ।
२. शान्ति को जो प्राप्त कर लेते हैं , सन्त कहलाते हैं ।
३. सन्तों के मत वा धर्म को सन्तमत कहते हैं ।
शान्ति प्राप्त करने का प्रेरण मनुष्यों के हृदय में स्वाभाविक.... 


    पदावली भजन नं.8 जिसका हेडिंग 'संतमत की परिभाषा' है, को शब्दार्थ सहित पढ़ने के लिए  👉 यहाँ दवाएँ ।  


महर्षि मेँहीँ पदावली  शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी-सहित पुस्तक में उपर्युक्त लेख निम्न प्रकार से प्रकाशित है-

 
श्री सद्गुरु की सार शिक्षा-- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित
श्री सद्गुरु की सार शिक्षा-- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित१
श्री सद्गुरु की सार शिक्षा-- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित २

श्री सद्गुरु की सार शिक्षा-- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित३

श्री सद्गुरु की सार शिक्षा-- शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित४


     प्रभु प्रेमियों !  "महर्षि मेँहीँ पदावली शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित" नामक पुस्तक के इस भजन के शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी द्वारा आपने जाना कि गुरु महाराज के मुख्य शिक्षाओं को हमेशा याद रखना चाहिए। जिससे कि उनके आज्ञापालन में किसी प्रकार का कोई त्रुटि ना रह जाए । इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। इस पद्य का पाठ किया गया है उसे सुननेे के लिए निम्नांकित वीडियो देखें।




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P07 || श्री सद्गुरु की सार शिक्षा का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी || संतमत सत्संग की प्रातःकालीन स्तुति-प्रार्थना P07 || श्री सद्गुरु की सार शिक्षा का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी || संतमत सत्संग की प्रातःकालीन स्तुति-प्रार्थना   Reviewed by सत्संग ध्यान on 1/09/2018 Rating: 5

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