तुलसी साहब 01 || आरती संग सतगुरु के कीजै || भावार्थ सहित || संतमत सत्संग की दैनिक आरती भाग 1

महर्षि मेँहीँ पदावली / आरती 1

     प्रभु प्रेमियों ! संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "संतवाणी सटीक" से संत तुलसी साहब जी महाराज की वाणी "आरती संग सतगुरु के कीजै...' का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी  के बारे  जानेंगे । जिसे सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज ने लिखा है। उपरोक्त वाणी संतमत सत्संग के दैनिक आरती का अभिन्न अंग है इसे प्रत्येक कार्यक्रम के अंत में और रोजाना होने वाले स्तुति प्रार्थना के अंत में गाई जाती है । इसलिए इसका  बड़ा ही महत्व है, अत: इसके अर्थ और भाव को हृदयंगम करते हुए इसका पाठ करना चाहिए ।

यह पद्य महर्षि मेँहीँ पदावली के 145 वें  नंबर पर प्रकाशित है इस पद के पहले वाले पद संख्या 144 को पढ़ने के लिए   👉यहां दबाएं.

तुलसी साहब 01, संतमत सत्संग की प्रात:+अपराह्न+सायं आरती, "आरती संग सतगुरु के कीजै,..." अर्थ सहित। संत तुलसी साहब और टीकाकार सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज
संत तुलसी साहब और टीकाकार महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

संतमत सत्संग की दैनिक आरती शब्दार्थ, भावार्थ और  टिप्पणी सहित

     प्रभु प्रेमियों ! संत तुलसी साहिब इसमें बताते है कि-  मनुष्य बार-बार जन्मने-मरने का दुख भोगता रहता है। संतलोग चेताते हुए बताते हैं कि मनुष्य जन्म अनमोल है। सत्संग ध्यान करते रहने से मोक्ष की प्राप्ति होती है । सत्संग के अंत में आरती अवश्य करना चाहिए, उससे पूजा-पाठ के दोषों का शमन हो जाता है। उसका एक तरह से प्रायश्चित हो जाता है।, संतमत सत्संग के अंत में यह पद्य तीनों समय यानि सुबह, अपराह्न एवं सायंकाल  गाई जाती है। आरती का यह पहला पद्य है । इसके  शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी निम्नलिखित हैं-


 ( नित की स्तुति- प्रार्थना के अंत में गायी जानेवाली संत तुलसी साहब की निम्नलिखित आरती यहाँ स्वतंत्र रूप में दी गयी है । ) 

145

॥ आरती ॥ 

संत तुलसी साहब, हाथरस वाले,
तुलसी साहब
आरति संग सतगुरु के कीजै । अन्तर जोत होत लख लीजै ॥१ ॥ पाँच तत्त्व तन अग्नि जराई । दीपक चास प्रकाश करीजै ॥ २ ॥ गगन थाल रवि शशि फल फूला । मूल कपूर कलश घर दीजै ॥३ ॥ अच्छत नभ तारे मुक्ताहल । पोहप माल हिय हार गुहीजै ॥४ ॥ सेत पान मिष्टान्न मिठाई । चन्दन धूप दीप सब चीजैं ॥५ ॥ झलक झाँझ मन मीन मँजीरा । मधुर मधुर धुनि मृदंग सुनीजै ॥६ ॥ सर्व सुगन्ध उड़ि चली अकाशा ।  मधुकर कमल केलि धुनि धीजै ॥७ ॥ निर्मल जोत जरत घट माहीं । देखत दृष्टि दोष सब छीजै ॥८ ॥ अधर - धार अमृत बहि आवै । सतमत द्वार अमर रस भीजै ॥ ९ ॥ पी - पी होय सुरत मतवाली ।  चढ़ि - चढ़ि उमगि अमीरस रीझै ॥ १० ॥ कोट भान छवि तेज उजाली । अलख पार लखि लाग लगीजै ॥११ ॥ छिन छिन सुरत अधर पर राखे । गुरु - परसाद अगम रस पीजै ॥ १२ ॥ दमकत कड़क कड़क गुरु - धामा । उलटि अलल ' तुलसी ' तन तीजै ॥१३ ॥    

शब्दार्थ

चास = बालकर । मूल = आरंभ । कपूर = जल्द जल उठनेवाला एक सुगंधि पदार्थ ; यहाँ अर्थ है - ज्योतिर्मय विन्दु । अच्छत = अक्षत , बिना टूटा हुआ चावल जो पूजा में चढ़ाया जाता है । मुक्ताहल = मुक्ताफल , मोती । पोहप = पुहप , पुष्प , फूल । गुहीजै = गूँथ लीजिये । सेत = श्वेत , उजला ; यहाँ अर्थ है- प्रकाश ( अंतःप्रकाश ) । मिष्टान्न ( मिष्ट+अन्न) = रुचिकर खाद्य पदार्थ । मिठाई = खाने की कोई मीठी चीज | झलक = प्रकाश । झाँझ = झाल । मजीरा = “ बजाने के लिए काँसे की छोटी कटोरियों की जोड़ी , ताल | " ( संक्षिप्त हिन्दी शब्द - सागर ) सर्वसुगंध =  इन्द्रिय घाटों में बिखरी हुई समस्त चेतन धाराएँ । ( जैसे फूल का सार सुगंध है , उसी तरह शरीर का सार चेतन धार है । इसीलिए चेतनधार ' सुगंध ' कही गयी है । ) मधुकर = भौंरा ; यहाँ अर्थ है- सुरत या मन । कमल = मंडल , अंदर का दर्जा या स्तर । केलि = क्रीड़ा , खेल । धीजै = धीरज धरता है , प्रसन्न होता है , संतुष्ट होता है , स्थिर होता है । अधर धार = आंतरिक आकाश की ज्योति और शब्द की धाराएँ । अमृत = चेतन तत्त्व | सतमत द्वार = सत्य धर्म का द्वार, दशम द्वार । ( सतमत = सत्य धर्म ; देखें - " तुलसी सतमत तत गहे , स्वर्ग पर करे खखार । " -संत तुलसी साहब ) उमगि = उमंग युक्त होकर , आनन्दित होकर । अमीरस = अमृत रस , ज्योति और नाद की प्राप्ति से उत्पन्न आनंद । रीझै = रीझता है , प्रसन्न होता है , संतुष्ट होता है । कोट = कोटि , करोड़ | छवि = सौंदर्य । तेज ( फा ० ) = तीव्र | अलख = जो देखा न जा सके , अरूप ; यहाँ अर्थ है- सारशब्द , कैवल्य मंडल, सतलोक । लाग लगीजै = लाग लगा लीजिये , संबंध स्थापित कर लीजिये । अधर = गगन , आंतरिक आकाश , ब्रह्मांड | अगम रस = वह आनंद जो किसी इन्द्रिय से नहीं  चेतन आत्मा से प्राप्त किया जा सके । दमकत = दमकता है , चमकता है । कड़क-कड़क = घोर शब्द करते हुए । अलल ( सं ० अलज ) = एक पक्षी का नाम । तीजै = तज दीजिये , छोड़ दीजिये ; तीनों ।  ( अन्य शब्दों की जानकारी के लिए "संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोश" देखें ) 

भावार्थ

( सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज के शब्दों में ) –

 “ सद्गुरु के संग प्रभु परमात्मा की आरती कीजिये और अंतर में ज्योति होती है , उसे देख लीजिये ॥१ ॥ 

सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज
सद्गुरु महर्षि मेँहीँ

तन के पाँच तत्त्वों की अग्नि को जला , दीपक बालकर प्रकाश कर लीजिये । इसका तात्पर्य यह है कि ध्यान अभ्यास करके पाँच तत्त्वों के भिन्न - भिन्न रंगों के प्रकाशों को देखिये और इसके अनन्तर दीपक - टेम की ज्योति का भी दर्शन कीजिये ॥२ ॥ 

शून्य के थाल में सूर्य और चन्द्र फल - फूल हैं और इस पूजा के मूल या आरंभ में कपूर अर्थात् श्वेत ज्योतिर्विन्दु का कलश स्थापन कीजिये ॥३ ॥ 

अंतराकाश में दर्शित सब तारे - रूप मोतियों का अच्छत ( अरवा चावल , जिसका नैवेद्य पूजा में हैं ) और ऊपर कथित फूलों का हार गूंथकर हृदय में पहन लीजिये अर्थात् अपने अंदर में उन फूलों का सप्रेम दर्शन कीजिये || ४ || 

पान , मिठाई , मिष्टान्न , चंदन , धूप और दीप- सब के सब उजले यानी प्रकाश हैं ॥५ ॥ 

झलक अर्थात् प्रकाश में झाँझ , मजीरा और मृदंग की मीठी ध्वनियों को मीन - मन से अर्थात् भाठे से सिरे ( नीचे से ऊपर स्थूल से सूक्ष्म ) की ओर चढ़नेवाले मन से सुनिये ॥६ ॥ 

शरीर में बिखरी हुई सुरत की सब धाररूप सुगंध आकाश में उठती हुई चलती है और उस मंडल में वह भ्रमर - सदृश खेलती हुई अनहद ध्वनि से संतुष्ट होती है || ७ || 

शरीर के अंदर ज्योति जलती है । दृष्टि से दर्शन होते ही सब दोष नाश को प्राप्त होते हैं ॥८ ॥ 

अधर ( आकाश ) की धारा में अमृत बहकर आता है , उस धारा में सत्य धर्म के द्वार पर आरती करनेवाला अभ्यासी अमर - रस में भींजता है ॥९ ॥ 

उस अमर - रस को पीकर  सुरत मस्त होती है और विशेष - से - विशेष चढ़ाई करके और उल्लसित होकर अमृत - रस में रीझती है | ॥ १०॥ 

करोड़ों सूर्य के सदृश प्रकाशमान सौंदर्य प्रकाशित है , अलख ( सारशब्द ) के पार ( शब्दातीत पद ) को लखकर संबंध लगा लीजिये || ११ || 

सुरत को क्षण - क्षण अधर पर रक्खे , तो गुरु प्रसाद से अगम रस पीवै || १२ || 

तुलसी साहब कहते हैं कि गुरुधाम ( परम पुरुष पद ) चमकता हुआ ध्वनित होता है । हे सुरत ! तुम अलल पक्षी की भाँति उलटकर अर्थात् बहिर्मुख से अंतर्मुख होकर तीनों शरीरों को छोड़ दो ॥१३ ॥ "


टिप्पणी

भावार्थ  लेखक बाबा छोटेलालदास जी महाराज
टिप्पणीकार- बाबा लालदास

१. मीन भाटे से सिरे की ओर चढ़ जाता है । जो मन दृष्टियोग के अभ्यास के द्वारा पिंड ( नीचे स्थूलता ) से ब्रह्मांड ( ऊपर - सूक्ष्मता ) में पहुँच जाता है , वही ' मन - मीन ' अर्थात् मीनवृत्तिवाला मन है ; वही प्रकाश मंडल में होनेवाली ध्वनियों को सुन पाता है । 

. कबीर पंथ की एक पुस्तक ' अनुराग - सागर ' के अनुसार , अलल पक्षी आकाश में बहुत ऊँचाई पर अंडा देता है । वह अंडा नीचे गिरते - गिरते फूट जाता है , उससे बच्चा निकल आता है । नीचे गिरते - गिरते ही उस बच्चे की आँखें खुल जाती हैं और पंख उग आते हैं , तब वह उलटकर अपनी माता के पास चला जाता है । 

३. बाहर में पूजा करने के लिए थाल , प्रज्वलित दीपक , फल - फूल , कलश , अच्छत , पुष्पमाल , पान , मिष्टान्न , मिठाई , चंदन , धूप और झाँझ , मजीरे , मृदंग वाद्य यंत्रों के वादन की व्यवस्था करनी पड़ती है ; परंतु दृष्टियोग के द्वारा अंतर्मुख हुए साधक के लिए बाह्य पूजा की इन सब चीजों का कोई अर्थ नहीं रह जाता । संत तुलसी साहब ने अपनी इस आध्यात्मिक आरती में यही बतलाया है । 

. आरती के इस पद्य के प्रत्येक चरण में ३२ मात्राएँ हैं ; १६-१६ पर यति और अन्त में दो गुरु वर्ण । ∆


।।  "महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ भावार्थ और टिप्पणी सहित" समाप्त   । 


सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज द्वारा बनाई गई आरती के दूसरे पद्य "आरती तन मंदिर में कीजै, दृष्टि युगल कर सन्मुख दीजै।" को पढ़ने के लिए    👉  यहां दबाएं।


सप्ताहिक सत्संग में आरती के पहले "भजु मन सतगुरु सतगुरु... नामक पदावली के तीसवें पद का गुरु-कीर्तन किया जाता है। उसे पढ़ने के लिए     👉 यहां दबाएं


प्रभु प्रेमियों ! "महर्षि मेंही पदावली शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित" पुस्तक में उपर्युक्त पद निम्नांकित प्रकार से प्रकाशित है-


तुलसी साहब 01 आरती संग सतगुरु के कीजै

तुलसी साहब 01 आरती संग सतगुरु के कीजै  शब्दार्थ सहित |

तुलसी साहब 01 आरती संग सतगुरु के कीजै  भावार्थ सहित



प्रभु प्रेमियों !  "महर्षि मेँहीँ पदावली शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहितनामक पुस्तक  से इस भजन के शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी द्वारा आपने जाना कि परम प्रभु परमात्मा की अलौकिक आरती कैसे की जाती है. इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क ईमेल द्वारा मिलती रहेगी। इस पद्य का पाठ किया गया है उसे सुननेे के लिए निम्नांकित वीडियो देखें।



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