गोरख वाणी 05 । Speech with mystical yoga । हँसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान । भावार्थ सहित -महर्षि मेंहीं

महायोगी गोरखनाथ की वाणी / 05

    प्रभु प्रेमियों ! संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "संतवाणी सटीकअनमोल कृति है। इस कृति में बहुत से संतो के वाणियों को एकत्रित किया गया है, जिससे यह सिद्ध हो सके कि सभी संतों के सार विचार एक ही हैं। उन सभी वाणियों का टीकाकरण किया गया है। आज महायोगी गोरखनाथ की वाणी "हँसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान।...' भजन का भावार्थ  पढेंगे। 

महायोगी गोरखनाथ जी महाराज की इस God भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन,भजन कीर्तन, पद्य, वाणी, छंद) "हँसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान।..." में बताया गया है कि- महान चमत्कारिक और रहस्यमयी योग युक्तियों से युक्त है । जब हम योग शब्द सुनते है तो हमारे मन में रहस्यमय विद्या, रहस्यमयी ग्रन्थ, हजारों वर्ष जीवित रखनेवाली रहस्यमयी विद्या,साधना रहस्य, Rahasya May Gyan,  गुप्त साधना, लययोग, हठयोग सिद्धि के लक्षण, इत्यादि के बारे में विचार करने लगता है। लेकिन इस पद में महायोगी गुरु गोरखनाथ जी महाराज योग के संबंध में जो बातें बताए हैं, वह निम्नलिखित प्रश्नों से मिलता जुलता है जैसे कि- योग की शक्तियां कैसे प्राप्त करें, लय योग क्या है? साधारण से साधारण व्यक्ति योग से कैसे लाभ ले सकता है? इत्यादि बातें।

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हँसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान, महायोगी गोरखनाथ जी महाराज बानी का उच्चारण करते हुए।
हँसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान,

Speech with mystical yoga

महायोगी संत श्रीगोरखनाथ जी महाराज कहते है कि '"हे अवधूतों ! हँसो , खेलो , ध्यान करो और दिन - रात ब्रह्मज्ञान का कथन करो । जो हँसे , खेले ; परन्तु मन को भंग न करे अर्थात् ध्येय तत्त्व में मन को लगाकर रखे , वे स्थिर होकर सदा नाथ के संग में रह सकते हैं । ....."  इस संबंध में विशेष जानकारी के लिए इस पद्य का भावार्थ  किया गया है। उसे पढ़ें- 

॥ मूल पद्य ॥

हँसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान , अहनिसि कथिबा ब्रह्मज्ञान ।
हँसै खेलै न करै मन भंग , ते निहचल सदा नाथ के संग ॥ अजपाजपै सुंनि मन धरै , पाँचो इन्द्रिय निग्रह करै ।
ब्रह्म अगनि में जो होमे काया , तास महादेव बन्दे पाया ।।
धन जोवन की करै न आस , चित्त न राखै कामिनी पास ।
नाद - बिन्द जाके घटि जरै , ताकी सेवा पारबति करै ।

 पद्यार्थ - हँसो , खेलो , ध्यान करो और दिन - रात ब्रह्मज्ञान का कथन करो । जो हँसे , खेले ; परन्तु मन को भंग न करे अर्थात् ध्येय तत्त्व में मन को लगाकर रखे , वे स्थिर होकर सदा नाथ के संग में रह सकते हैं । ' अजपा का जप करे , मन को शून्य में धरे ' पाँचो ज्ञानेन्द्रियों को रोके रहे और ' जो ब्रह्माग्नि में काया को होमे ' महादेव तिनके पैर का वन्दन करे । धन और जवानी की आशा नहीं करे , अपने चित्त को स्त्रियों के पास में नहीं रखे । नाद और विन्दु जिनके घट में जलते रहते हैं अर्थात् जिनके घट में ज्योतिर्विन्दु और ब्रह्मनाद की अनुभूतियाँ होती रहती हैं , उनकी सेवा पार्वती करे । ॥ गोरखनाथ की वाणी समाप्त ।

गुरु गोरखनाथ जी महाराज के इस भजन के बाद "संतवाणी सुधा सटीक" से गोरख वाणी भावार्थ सहित पढ़ने के लिए    यहां दबाएं।

प्रभु प्रेमियों !  "संतवाणी-सटीक" नामक पुस्तक  से इस भजन के शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी द्वारा आपने जाना कि जब हम योग शब्द सुनते है तो हमारे मन में रहस्यमय विद्या, रहस्यमयी ग्रन्थ, हजारों वर्ष जीवित रखनेवाली रहस्यमयी विद्या,साधना रहस्य, Rahasya May Gyan,  गुप्त साधना, लययोग, हठयोग सिद्धि के लक्षण, इत्यादि के बारे में विचार करने लगता है। इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने।  इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। इस पद्य का पाठ किया गया है उसे सुननेे के लिए निम्नांकित वीडियो देखें।




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गोरख वाणी 05 । Speech with mystical yoga । हँसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान । भावार्थ सहित -महर्षि मेंहीं गोरख वाणी 05 । Speech with mystical yoga । हँसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान । भावार्थ सहित -महर्षि मेंहीं Reviewed by सत्संग ध्यान on 6/23/2020 Rating: 5

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