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7/10/2020

सूरदास 23, Why should not ego । जा दिन मन पंछी उड़ि जैहैं । भजन भावार्थ-सहित -स्वामी लालदास

संत सूरदास की वाणी  / 23

प्रभु प्रेमियों ! संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्रमाणित करते हुए "संतवाणी सटीक"  भारती (हिंदी) पुस्तक में लिखते हैं कि सभी संतों का मत एक है। इसके प्रमाण स्वरूप बहुत से संतों की वाणीओं का संग्रह कर उसका शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया हैं। इसके अतिरिक्त भी "सत्संग योग" और अन्य पुस्तकों में संतवाणीयों का संग्रह है। जिसका टीकाकरण पूज्यपाद लालदास जी महाराज और अन्य टीकाकारों ने किया है। यहां "संतवाणी-सुधा सटीक" में प्रकाशित भक्त  सूरदास जी महाराज  की वाणी "जा दिन मन पंछी उड़ि जैहैं,...'  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणियों को पढेंगे। 

इस भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन, पद्य, वाणी, छंद)  में बताया गया है कि- इस नश्वर संसार में कुछ नहीं रखा, किसको कब कौन सा दिन देखना पड़े कुछ भी निश्चित नहीं है। अहंकार मनुष्य के पतन का कारण होता है। धन दौलत, काया, सुंदरता के लिए इंसान को अहंकार नहीं करना चाहिए, बल्कि ईश्वर का धरोहर समझ कर उसका सदुपयोग करना चाहिए।   इन बातों के साथ-साथ निम्नलिखित प्रश्नों के भी कुछ-न-कुछ समाधान पायेंगे। जैसे कि-  अहंकार सुविचार, अहंकारी व्यक्ति, अहंकार पर कहानी, अहंकारी को उसका अहंकार मारता है, अहंकार शायरी, मनोविज्ञान में अहंकार क्या है,जा दिन मन पंछी उड़ जैहैं का अर्थ,दौलत-काया और सुंदरता का कभी अहंकार नहीं करना चाहिए,अहंकार से ज्ञान का नाश, अहंकार व्यक्ति के पतन का मुख्य कारण है, अहंकार विनाश का कारण है, अहंकारी को उसका अहंकार मारता है, अहंकारी व्यक्ति, इत्यादि बातों को समझने के पहले, आइए ! भक्त सूरदास जी महाराज का दर्शन करें। 

इस भजन के पहले वाले पद्य  "अबके माधव मोहि उघारि," को भावार्थ सहित पढ़ने के लिए  यहां दबाएं।

जा दिन मन पंछी उड़ि जैहैं भजन गाते हुए भक्त सूरदास जी महाराज एवं भजन भावार्थकार -स्वामी लालदास
जा दिन मन पंछी उड़ि जैहैं

7/09/2020

सूरदास 22, Worldly sorrow and salvation ।। अबके माधव मोहि उघारि ।। भजन भावार्थ सहित -स्वामी लालदास

संत सूरदास की वाणी  / 22

प्रभु प्रेमियों ! संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्रमाणित करते हुए "संतवाणी सटीक"  भारती (हिंदी) पुस्तक में लिखते हैं कि सभी संतों का मत एक है। इसके प्रमाण स्वरूप बहुत से संतों की वाणीओं का संग्रह कर उसका शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया हैं। इसके अतिरिक्त भी "सत्संग योग" और अन्य पुस्तकों में संतवाणीयों का संग्रह है। जिसका टीकाकरण पूज्यपाद लालदास जी महाराज और अन्य टीकाकारों ने किया है। यहां "संतवाणी-सुधा सटीक" में प्रकाशित भक्त  सूरदास जी महाराज  की वाणी "अबके माधव मोहि उघारि,...'  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणियों को पढेंगे। 

इस भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन, पद्य, वाणी, छंद)  में बताया गया है कि- सांसारिक दुखों से व्यथित व्यक्ति को सुख पाने के क्या-क्या उपाय हो सकते हैं? व्यक्ति किन कारणों से दूखित होता है?उसका निवारण का प्रमाणिक उपाय क्या है? इस विषय को अच्छी तरह समझाया गया है।   इन बातों के साथ-साथ निम्नलिखित प्रश्नों के भी कुछ-न-कुछ समाधान पायेंगे। जैसे कि-  सांसारिक दुख से उद्धार, सूरदास और कृष्ण, सांसारिक दुख meaning,सांसारिक meaning in हिन्दी,संसारिक अर्थ, duh, dukhee vichaaron, duhkh dukh arth, dukhad arth, dukhee, duhkhad du kh maianing,दु:ख क्यों, मनुष्य दु:खी क्यों है, दुःख से मुक्ति, दुःख से मत घबराना पंछी, दुखी शायरी, दुःख से छुटकारा, दुःख,सुख कहां है, इत्यादि बातों को समझने के पहले, आइए ! भक्त सूरदास जी महाराज का दर्शन करें। 

इस भजन के पहले वाले पद्य  "अपुनपौ आपुन ही में पायो," को भावार्थ सहित पढ़ने के लिए  यहां दबाएं।

सांसारिक दुख से छूटने का उपाय । भक्त सूरदास जी महाराज और ठीकाकार
सांसारिक दुख से छूटने का उपाय


7/05/2020

कबीर वाणी 10, Identity of self । अपनपौ आपुहि तें बिसरो । भावार्थ सहित महर्षि मेंहीं

संत कबीर साहब के वाणी / 10

प्रभु प्रेमियों ! संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज "संतवाणी सटीक"  भारती (हिंदी) पुस्तक में बहुत से संतों की वाणीओं का संग्रह कर उसका शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी द्वारा प्रमाणित करते हुए  लिखते हैं कि सभी संतों का मत (विचार) एक ही है। इन्हीं वाणीयों में से संत कबीर साहब की वाणी  "अपनपौ आपुहि तें बिसरो,...." के बारे में पढ़ेंगे।

संत सद्गुरु कबीर साहब जी महाराज की इस गुरु भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन,भजन कीर्तन, पद्य, वाणी, छंद) में बताया गया है कि-  आत्म स्वरूप की पहचान । स्वरूप को जानना ही अपने आप की सच्ची पहचान है, आत्म-ज्ञान की प्राप्ति संत समागम से होती है। ज्ञानी की कृपा से अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है। यदि खुद के स्वरूप को पहचान लिया तो फिर वह दर्शन ईश्वर स्वरूप का ज्ञान करा देता है  । इन बातों के साथ-साथ निम्नलिखित बातों पर भी कुछ-न-कुछ चर्चा मिलेगा। जैसे कि-     गुरु Kabir दे शब्द, गुरु Kabir दास जी के भजन, Book by Kabir Das, कबीर वाणी लेखक,कबीर वाणी के दोहे,कबीर वाणी के बारे में,कबीर साहिब की वाणी,संत कबीर की वाणी,आत्मा, आत्मज्ञान, ज्ञानी पुरुष की पहचान, संत कबीर में आत्मा का स्वरूप, आदि बातें। इन बातों को समझने के पहले, आइए ! संत कबीर साहब के दर्शन करें।

सदगुरु कबीर साहब के इस भजन के पहले वाले भजन "मैं तो आन पड़ी चोरन के नगर...'  को अर्थ सहित पढ़ने के लिए    यहां दबाएं।

अपनपौ आपुहि तें बिसरो, संत कबीर साहब के भजन का विस्तार से व्याख्या सद्गुरु महर्षि मेंही द्वारा।
अपनपौ आपुहि तें बिसरो

सूरदास 21, Where is the inner happiness । अपुनपौ आपुन ही में पायो । भजन भावार्थ सहित -स्वामी लालदास

संत सूरदास की वाणी  / 21

प्रभु प्रेमियों ! संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्रमाणित करते हुए "संतवाणी सटीक"  भारती (हिंदी) पुस्तक में लिखते हैं कि सभी संतों का मत एक है। इसके प्रमाण स्वरूप बहुत से संतों की वाणीओं का संग्रह कर उसका शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया हैं। इसके अतिरिक्त भी "सत्संग योग" और अन्य पुस्तकों में संतवाणीयों का संग्रह है। जिसका टीकाकरण पूज्यपाद लालदास जी महाराज और अन्य टीकाकारों ने किया है। यहां "संतवाणी-सुधा सटीक" में प्रकाशित भक्त  सूरदास जी महाराज  की वाणी "अपुनपौ आपुन ही में पायो,...'  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणियों को पढेंगे। 

इस भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन, पद्य, वाणी, छंद) में बताया गया है कि-   संसार में बहुत से लखपती हैं, करोड़पति भी है क्या वे सभी सुखी है? क्या उन्हें आन्तरिक शान्ति है? पृथ्वी पर हर एक जीव सुख की इच्छा करता है।  सुख एक मानसिक स्थिति है और यह एक अनुभूति है जो स्वयं अंदर से महसूस होती है।  आज का इंसान अपने दुख से बहुत कम दुखी है, परंतु दूसरे के सुख को देखकर ज्यादा दुखी है।    ऐसे में हमें कष्ट और दुख भोगना पड़ता है। स्थाई सुख तब मिलता है, जब हम अपने जीवन में ही इस जन्ममरण के बंधन से छूटकर अपने स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर लें । जब मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है, तब फिर उसे इस संसार में आकर जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती । इन बातों के साथ-साथ निम्नलिखित प्रश्नों के भी कुछ-न-कुछ समाधान पायेंगे। जैसे कि-  सच्चा सुख क्या है, सुख कैसे मिलता है, भौतिक सुख क्या होता है, जीवन का सुख, आंतरिक सुख, Sampuran Soorsagar Lokbharti Tika, राग बिलावल, अपुनपौ आपुन ही मैं पायो, सूरदास के पद - कविता कोश, सूर विनय पत्रिका, सूरदास के भाव पक्ष की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए, काव्य खंड सूरदास, सूरदास और कृष्ण, किंधौ सूर को सर लग्यो, सूरदास के पद, इत्यादि बातों को समझने के पहले, आइए ! भक्त सूरदास जी महाराज का दर्शन करें। 

इस भजन के पहले वाले पद्य  "अपुनपौ आपुन ही विसर्यो," को भावार्थ सहित पढ़ने के लिए  यहां दबाएं।

भक्त सूरदास जी महाराज भजन गाते हुए और साथ में टीकाकार लाल दास जी महाराज।
भक्त सूरदास जी महाराज भजन गाते हुए।

7/04/2020

सूरदास 20, Maya and Moksha Accurate Analysis । अपुनपौ आपुन ही विसर्यो । भजन भावार्थ सहित -स्वामीलालदास

संत सूरदास की वाणी  / 20

प्रभु प्रेमियों ! संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्रमाणित करते हुए "संतवाणी सटीक"  भारती (हिंदी) पुस्तक में लिखते हैं कि सभी संतों का मत एक है। इसके प्रमाण स्वरूप बहुत से संतों की वाणीओं का संग्रह कर उसका शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया हैं। इसके अतिरिक्त भी "सत्संग योग" और अन्य पुस्तकों में संतवाणीयों का संग्रह है। जिसका टीकाकरण पूज्यपाद लालदास जी महाराज और अन्य टीकाकारों ने किया है। यहां "संतवाणी-सुधा सटीक" में प्रकाशित भक्त  सूरदास जी महाराज  की वाणी "अपुनपौ आपुन ही विसर्यो,...'  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणियों को पढेंगे। 

इस भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन, पद्य, वाणी, छंद) "अपुनपौ आपुन ही विसर्यो। ,..." में बताया गया है कि-   मोक्ष क्या है? मोक्ष का सामान्य अर्थ दुखों का विनाश है। दुखों के आत्यन्तिक निवृत्ति को ही मोक्ष कहते हैं।  मोक्ष का अर्थ जन्म और मरण के चक्र से मुक्त होने अलावा सर्वशक्तिमान बन जाना है। मोक्ष का अर्थ होता है मुक्ति। अधिकतर लोग समझते हैं कि मोक्ष का अर्थ जीवन-मरण के चक्र से छूट जाना। भारतीय दर्शनों में कहा गया है कि जीव अज्ञान के कारण ही बार बार जन्म लेता और मरता है । इस जन्ममरण के बंधन से छूट जाने का ही नाम मोक्ष है । जब मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है, तब फिर उसे इस संसार में आकर जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती ।    इन बातों के साथ-साथ निम्नलिखित प्रश्नों के भी कुछ-न-कुछ समाधान पायेंगे। जैसे कि-  मुक्ति और मोक्ष में क्या अंतर है, मोक्ष कब मिलता है, मुक्ति का मार्ग कौन सा है, मोक्ष कैसे प्राप्त करें,मोक्ष मंत्र,मोक्ष क्या है,मोक्ष का पर्यायवाची,मोक्ष नाम का अर्थ,मुक्ति और मोक्ष में क्या अंतर है, इत्यादि बातों को समझने के पहले, आइए ! भक्त सूरदास जी महाराज का दर्शन करें। 

इस भजन के पहले वाले पद्य  "जा दिन सन्त पाहुने आवत," को भावार्थ सहित पढ़ने के लिए  यहां दबाएं।

भजन गाते हुए भक्त सूरदास जी महाराज- अपुनपौ आपुन ही विसर्यो । भजन भावार्थ सहित -स्वामीलालदास
अपुनपौ आपुन ही विसर्यो

सूरदास 19, Benefit from saint darshan ।। जा दिन सन्त पाहुने आवत ।। भजन भावार्थ सहित । -स्वामी लालदास।

संत सूरदास की वाणी  / 19

प्रभु प्रेमियों ! संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्रमाणित करते हुए "संतवाणी सटीक"  भारती (हिंदी) पुस्तक में लिखते हैं कि सभी संतों का मत एक है। इसके प्रमाण स्वरूप बहुत से संतों की वाणीओं का संग्रह कर उसका शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया हैं। इसके अतिरिक्त भी "सत्संग योग" और अन्य पुस्तकों में संतवाणीयों का संग्रह है। जिसका टीकाकरण पूज्यपाद लालदास जी महाराज और अन्य टीकाकारों ने किया है। यहां "संतवाणी-सुधा सटीक" में प्रकाशित भक्त  सूरदास जी महाराज  की वाणी "जा दिन सन्त पाहुने आवत,...'  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणियों को पढेंगे। 

इस भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन, पद्य, वाणी, छंद) "जा दिन सन्त पाहुने आवत । ,..." में बताया गया है कि-   संत. दर्शन. से. लाभ. साधु-संतों का जब हम दर्शन करते हैं तो वे हमें कुछ व्रत नियम लेने की प्रेरणा देते हैं ।  संत ज्ञान की खान होते हैं, इनसे जितना ले सको, ले लेना, फिर क्यों उनके दर्शन लाभ से वंचित रहा जाए?  धर्म और दर्शन के मूल तत्व का उपदेश करने की संता से प्रार्थना करना चाहिए। कबहु दर्शन पाय हैं चरण - कमल की सेव। इन बातों के साथ-साथ निम्नलिखित प्रश्नों के भी कुछ-न-कुछ समाधान पायेंगे। जैसे कि- क्या प्राप्त होता है संत दर्शन और सत्संग से, Rishi Darshan, संत दर्शन व सत्संग का लाभ लेते रहना चाहिए, संत दर्शन क्यों और कैसे करे कब करे,संत दर्शन क्यों करें, दर्शन-प्रवचन-सेवा का लाभ, संत ज्ञान की खान होते हैं,       इत्यादि बातों को समझने के पहले, आइए ! भक्त सूरदास जी महाराज का दर्शन करें। 

इस भजन के पहले वाले पद्य  "अविगत गति कछु कहत न आवै," को भावार्थ सहित पढ़ने के लिए  यहां दबाएं।

जा दिन सन्त पाहुने आवत भजन गाते हुए भक्त सूरदास जी महाराज और    टीका कार- स्वामी लालदास।
जा दिन सन्त पाहुने आवत

7/03/2020

सूरदास 18, Where does god live । अविगत गति कछु कहत न आवै । भजन भावार्थ सहित । -स्वामी लालदास।

संत सूरदास की वाणी  / 18

प्रभु प्रेमियों ! संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज प्रमाणित करते हुए "संतवाणी सटीक"  भारती (हिंदी) पुस्तक में लिखते हैं कि सभी संतों का मत एक है। इसके प्रमाण स्वरूप बहुत से संतों की वाणीओं का संग्रह कर उसका शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया हैं। इसके अतिरिक्त भी "सत्संग योग" और अन्य पुस्तकों में संतवाणीयों का संग्रह है। जिसका टीकाकरण पूज्यपाद लालदास जी महाराज और अन्य टीकाकारों ने किया है। यहां "संतवाणी-सुधा सटीक" में प्रकाशित भक्त  सूरदास जी महाराज  की वाणी "अविगत गति कछु कहत न आवै,...'  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणियों को पढेंगे। 

इस भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन, पद्य, वाणी, छंद) "अविगत गति कछु कहत न आवै । ,..." में बताया गया है कि-   परब्रह्म या परम-ब्रह्म ब्रह्म का वो रूप है, जो निर्गुण और असीम है। "नेति-नेति" करके इसके गुणों का वर्णन किया गया है।  ब्रह्म कौन है? परम-तत्त्व के निराकार स्वरूप को ब्रह्म कहते है। ब्रह्म का स्वरूप निर्गुण और असीम है। ब्रह्म जगत् का कारण है, यह ब्रह्म का तटस्थ लक्षण है । जो तुम्हारा अपना स्वरूप है , वह ब्रह्म है । ओमकार जिनका स्वरूप है, ओम जिसका नाम है, उस ब्रह्म को ही ईश्‍वर, परमेश्वर, परमात्मा, प्रभु आदि कहते हैं। ब्रह्म क्या है? ब्रह्म-स्वरूप क्या है? ईश्वर कहां रहता है? इन बातों के साथ-साथ निम्नलिखित प्रश्नों के भी कुछ-न-कुछ समाधान पायेंगे। जैसे कि-     ब्रह्म का स्वरूप क्या है, पूर्ण ब्रह्म क्या है,  परब्रह्म क्या है, ब्रह्म ज्ञान का अर्थ, परमात्मा का स्वरूप क्या है? ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या श्लोक,  ब्रह्म क्या है? ब्रह्म का विलोम,परब्रह्म शिव आत्मा का स्वरुप क्या है? परमात्मा का मतलब क्या होता है? परमात्मा क्या है? ब्रह्म,  इत्यादि बातों को समझने के पहले, आइए ! भक्त सूरदास जी महाराज का दर्शन करें। 

इस भजन के पहले वाले पद्य  "झूठेही लगि जनम गँवायौ" को भावार्थ सहित पढ़ने के लिए  यहां दबाएं।

अविगत गति कछु कहत न आवै
अविगत गति कछु कहत न आवै

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