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P03 मंगल मूर्ति सतगुरु || प्रातःकालीन स्तुति प्रार्थना महर्षि मेंहीं पदावली भजन शब्दार्थ भावार्थ सहित

महर्षि मेंहीं पदावली / 03

     प्रभु प्रेमियों ! संतवाणी अर्थ सहित में आज हम लोग जानेंगे- संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "महर्षि मेंहीं पदावली" जो हम संतमतानुयाइयों के लिए गुरु-गीता के समान अनमोल कृति है। इस कृति के 03 रे पद्य  "मंगल मूर्ति सतगुरु,.....''  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी के बारे में; जिसे पूज्यपाद लालदास जी महाराज नेे किया है।

इस पद को संतमत सत्संग के प्रातः कालीन स्तुति विनती के रूप में गाते हैं। इसके पहले जो "सब संतन की बड़ि बलिहारी।" पद्य गाया जाता है; उसको पढ़ने के लिए  👉     यहां दबाएं। 

गुरु का गुणगान करते सद्गुरु महर्षि मेंहीं और टीकाकार
गुरु का गुणगान करते सद्गुरु महर्षि मेंहीं और टीकाकार

Praise the master like this?  "मंगल मूर्ति सतगुरु,..."

     प्रभु प्रेमियोंइस गुरु-स्तुति संबंधित ( कविता, पद्य, वाणी ) में बताया गया है कि- गुरु कैसे होते हैं? उनकी महिमा कैसा है? कोई भी व्यक्ति गुरु की महिमा का गुणगान करते हुए अघाता क्यों नहीं है? गुरु की स्तुति कैसे करें? गुरु की सेवा कैसे करें? गुरु की पूजा कैसे करें? गुरु से प्रार्थना कैसे करें? आदि विषयों पर विशेष रूप से चर्चा की गई है ।  इन बातों को समझने के लिए इस पोस्ट को पूरा पढ़ें-

     सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज जी  कहते हैं- "अत्यंत सुहावने रूप वाले सतगुरु सबके आधाररूप परमात्मा से मिलाते हैं। वे कल्याण (अच्छाई, भलपन) से भरे हुए और भक्तों के कल्याण करने वाले हैं। मैं बारंबार उनका गुणगान करते हुए उन से विनती करता हूं। Praise the master like this?  "मंगल मूर्ति सतगुरु,...." इस विषय में पूरी जानकारी के लिए इस भजन का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया है। उसे पढ़े-

महर्षि   मेंहीं  पदावली 


( ३ )

 प्रातःकालीन गुरु - स्तुति

 मंगल  मूरति   सतगुरू ,      मिलवैं      सर्वाधार ।
 मंगलमय  मंगल  करण,   विनवौं        बारम्बार ॥१ ॥
 ज्ञान - उदधि अरु ज्ञान - घन, सतगुरु शंकर रूप ।
 नमो - नमो बहु बार ही ,    सकल सुपूज्यन भूप ॥२ ॥
 सकल भूल नाशक प्रभू ,   सतगुरु परम कृपाल ।
 नमो कंज-पद युग पकड़ि, सुनु प्रभु नजर निहाल ॥३॥ 
 दया- दृष्टि करि नाशिये ,    मेरो  भूल  अरु चूक ।
 खरो तीक्ष्ण बुधि मोरि ना, पाणि जोड़ि कहुँ कूक ॥४॥
 नमो गुरू सतगुरु नमो ,    नमो   नमो     गुरुदेव ।
 नमो  विध्न  हरता गुरू ,     निर्मल   जाको भेव ॥ ५ ॥
 ब्रह्म - रूप सतगुरु  नमो ,   प्रभु  सर्वेश्वर    रूप ।
 राम दिवाकर रूप गुरु,  नाशक भ्रम - तम - कूप ॥६ ॥   
 नमो सुसाहब सतगुरू ,   विघ्न विनाशक द्याल ।
 सुबुधि विगासक ज्ञानप्रद,नाशक भ्रम-तम-जाल ॥७ ॥  
 नमो - नमो सतगुरु नमो , जा सम कोउ न आन ।
 परम पुरुष हू  तें  अधिक ,    गावें  सन्त  सुजान ॥८ ॥

 शब्दार्थ - मंगल = कल्याण , अच्छाई , भलाई , आनन्द , मनोहर , सुहावना , सुन्दर । मूरति- मूर्ति , रूप , रूपवाला , व्यक्त पुरुष । मिलवै = मिला , मिलाते हैं , प्राप्त कराते हैं । सर्वाधार = ( सर्व + आधार ) -सबका आधार । मंगलमय - कल्याण से भरा हुआ , आनन्द से भरा हुआ , शुभ गुणों से परिपूर्ण । मंगल करण - कल्याण करनेवाला , आनन्द देनेवाला । विनवौं - विनती ( प्रार्थना ) करता हूँ , गुणगान करता हूँ । ज्ञान - उदधि - ज्ञान के समुद्र , अपार ज्ञानवाले , ज्ञान के भंडार । ज्ञान - घन - ज्ञान - समूह , ज्ञान की खान , ज्ञान के बादल , ज्ञान - रूपी जल की वर्षा करनेवाला । ( गो ० तुलसीदासजी ने भी हनुमान्जी की वन्दना करते हुए उन्हें ' ज्ञानघन ' कहा है ; देखें- " प्रनवौं पवनकुमार , खल वन पावक ज्ञानधन । " - मानस , बालकांड । ) शंकर ( शम् + कर ) -कल्याण करनेवाला । शंकररूप = कल्याणकारी रूप । ( रामचरितमानस , बालकांड के आदि में भी गुरु की वंदना करते हुए उन्हें शंकररूप बताया गया है ; यथा- " वन्दे बोधमयं नित्यं गुरु शंकररूपिणम्" ) सुपूज्यन भूप - अनिवार्य रूप से पूजे जानेयोग्य ( आदर करनेयोग्य ) व्यक्तियों में जो श्रेष्ठ हो । ( सुपूज्य - सबसे अधिक पूजनीय । भूप - राजा , श्रेष्ठ । माता - पिता और अन्य गुरुजन भी आदरणीय हैं ; परन्तु संत सद्गुरु सबसे अधिक आदरणीय हैं ; क्योंकि उनसे बढ़कर और किन्हीं का उपकार नहीं हो सकता । ) नमो = नमः , नमस्कार , प्रणाम । कंज ( कम् + ज ) जो जल में उत्पन्न हुआ हो ; यहाँ अर्थ है कमल । पद - चरण । युग - दोनों । नजर निहाल ( अरबी - फारसी ) -दृष्टि डालकर सभी इच्छाओं को पूर्ण कर देनेवाला या खुशहाल कर देनेवाला । सकल - सब । परम = अत्यन्त । भूल - चूक - असावधानी , आलस्य , और अज्ञानतावश होनेवाली गलतियाँ , दोष , कसूर , अपराध । ( कुछ गलतियाँ आदत , आवश्यकता , लज्जा - संकोच और षड्विकारवश भी होती हैं । ) खरी - खरा , अच्छा , सुन्दर , शुद्ध , पवित्र ; देखें- " यह दुविधा पारस नहिं जानत , कंचन करत खरो । " ( भक्त सूरदासजी ) ना - न , नहीं । पाणि - हाथ । कूक - कूककर , दुःखी स्वर में चिल्लाकर या पुकारकर ; देखें- " केसो कहि - कहि कूकिए , ना सोइयै असरार । रात दिवस के कूकण , कबहूँ लगै पुकार ।। " ( संत कबीर साहब ) विघ्न - बाधा , उलझन , आफत । भेव - भेद , ज्ञान , युक्ति , रहस्य ; देखें- " विधि औ हरि हर पावत नाहीं , बिना गुरू प्रभु भेव जी " ( ९२ वाँ पद्य ) ब्रह्मरूप - श्वेत ज्योतिर्मय विन्दु - रूपी । ( श्वेत ज्योतिर्मय विन्दु ब्रह्म का छोटे - से - छोटा सगुण - साकार रूप है । ) राम दिवाकर - सूर्यब्रह्म । ( राम - ब्रह्म । दिवाकर - सूर्य । त्रिकुटी में दिखाई पड़नेवाला सूर्य ब्रह्म और गुरु का अत्यन्त तेजोमय सगुण - साकार रूप है । पदावली के ८८ वें पद्य में इसे ब्रह्मदिवाकर कहकर गुरु का रूप बताया गया है ; देखें- " जहाँ ब्रह्म दिवाकर रूप गुरू धर , करें परम परकाश रे । " ) भ्रम तम कूप - सूखे गहरे कुएँ के समान दु:ख देनेवाला अज्ञान - अंधकार । ( किसी चीज के बारे में कुछ नहीं जानना अज्ञानता है ; परन्तु किसी चीज को कुछ दूसरी ही चीज समझ लेना भ्रम है ; जैसे रस्सी को साँप समझ लेना । भ्रम का कारण अज्ञानता ही है । ) सु - सुन्दर , श्रेष्ठ । साहब ( अरबी ) -स्वामी । सुबुधि - सुन्दर बुद्धि , अच्छी बुद्धि , सात्त्विकी बुद्धि , अच्छा ज्ञान । विगासक - विकासक , विकास करनेवाला , बढ़ानेवाला । द्याल - दयाल , दयालु । ज्ञान - प्रद - ज्ञान प्रदान करनेवाला । भ्रम तम जाल - बंधन - रूप अज्ञान - अंधकार । आन - अन्य , दूसरा । परम पुरुषहू तें - परम पुरुष ( परमात्मा ) से भी । सुजान - सुन्दर ( अच्छे ) ज्ञानवाला । ( अन्य शब्दों की जानकारी के लिए "संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोश" देखें ) 


भावार्थ -

टीकाकार- पूज्यपाद छोटेलाल दास जी महाराज, संतनगर, बरारी, भागलपुर-3, बिहार भारत।
टीकाकार लालदासजी 
अत्यन्त सुहावने रूपवाले सद्गुरु सबके आधार - रूप परमात्मा से मिलाते । वे कल्याण ( अच्छाई , भलपन ) से भरे हुए और भक्तों के कल्याण करनेवाले हैं । मैं बारंबार उनका गुणगान करते हुए उनसे विनती करता हूँ ॥१ ॥

वे ज्ञान के समुद्र , ज्ञान के बादल और कल्याणकारी पुरुष हैं । मैं उनको बारंबार प्रणाम करता हूँ ; क्योंकि वे अवश्य पूजे जानेयोग्य ( आदर किये जानेयोग्य ) सभी व्यक्तियों में श्रेष्ठ हैं ॥२ ॥ 

हे स्वामी सद्गुरु । आप भक्तों पर अत्यन्त कृपा करनेवाले और उनसे होनेवाली सब प्रकार की गलतियों को दूर कर देनेवाले हैं । आपके दोनों चरणकमल पकड़कर मैं आपको प्रणाम करता हूँ ! मात्र दृष्टि डालकर भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण कर डालनेवाले हे स्वामी ! आप मेरी प्रार्थना सुनिये ॥३ ॥ 

आप अपनी दया को दृष्टि मेरो ओर डालकर मुझसे होनेवाली सभी गलतियों को मिटा डालियेगलतियां होने का कारण है कि मेरी बुद्धि पवित्र और तेज नहीं है । इसलिए मैं हाथ जोड़कर और अत्यन्त दुःख - भरे स्वर में पुकारकर प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरी बुद्धि को अत्यन्त पवित्र और तेज बना दीजिये ।।४ ।। 

मैं तेजस्वी रूप और अलौकिक गुणोंवाले तथा भक्तों के जीवन में आनेवाली बाधाओं को हर लेनेवाले उन सच्चे गुरु का वारंवार प्रणाम करता हूँ , जिनका भेद ( ज्ञान , युक्ति ) हृदय को पवित्र कर देनेवाला है ।।५ ।। 

ब्रह्मरूपी ( छोटे - से - छोटे श्वेत ज्योतिर्मय विन्दु - रूपी ) , अनादि - अनन्त परमात्मस्वरूपी और त्रिकुटी में दर्शित होनेवाले सूर्यब्रह्मरूपी उन सद्गुरु को बारंबार प्रणाम करता हूँ , जो अत्यन्त दुःखदायी अज्ञान अंधकार को विनष्ट कर डालनेवाले हैं ।।६ ॥

बाधाओं को नष्ट कर डालनेवाले , अत्यन्त दयालु और सर्वश्रेष्ठ स्वामी सद्गुरु को प्रणाम करता हूँ , जो भक्तों की सुबुद्धि ( सद्ज्ञान ) को बढ़ानेवाले , लौकिक - पारलौकिक ज्ञान देनेवाले और बंधनरूप अज्ञान-अंधकार को विनष्ट करनेवाले हैं ।। ७।। 

उन सदगुरु को वारंवार नमस्कार है , जिनके समान दुसरा कोई भी नहीं है । ये परम पुरष ( परमात्मा ) में भी अधिक महिमावाले हैं , ऐसा अच्छे ज्ञानवाले सन्त जन उनकी प्रशंमा में प्रेमपूर्वक गाते हैं ॥८ ॥


 टिप्पणी -

. आज्ञाचक्रकेन्द्रविन्दु में दिखाई पड़नेवाला श्वेत गोतिर्मय बिन्दु ब्राह्म ( परम प्रभु परमात्मा ) का छोटे से छोटा सगुण - साकार रूप माना जाता है ; देखें- " लखत - लखत छवि विन्दु प्रभू की , ज्योति मंडल धौस धाई हो " ( ३३ वाँ पद्य ) " अणुह से अणु रूप ब्रह्म संग , सहजहिं सुरत मिलाई । " ( ६६ वाँ पद्य ) " बाँका परदा खोलिके , सन्मुख ले दीदार । बाल सनेही साइयाँ , आदि अन्त का यार ।। " ( संत कबीर साहब )  " नैन नासिका अग्र है , तहाँ ब्रह्म को वास । अविनाशी विनसै नहीं , हो सहज ज्योति परकाश ।। " ( सूरदासजी ) 

. ' ज्ञान उदधि ' से बताया गया है कि संत सद्गुरु ज्ञान के भंडार हैं और ' ज्ञान - घन ' ( ज्ञान के बादल ) से सूचित किया गया कि वे बादल की तरह घूम - घूमकर ज्ञानरूपी जल की वर्षा करते हैं । इति।।



इस पद्य के बाद वाले पद्य "जय जय परम प्रचंड,..'' को भावार्थ सहित पढ़ने के लिए 👉 यहां दबाएं।


     प्रभु  प्रेमियों !  "महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित" नामक पुस्तक  से इस भजन के शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी द्वारा आपने जाना कि , गुरु महिमा, गुरु स्तुति पद, गुरु स्तुति पद का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी, गुरु कैसे होते हैं, गुरु की स्तुति कैसे करें, गुरु की सेवा कैसे करें, गुरु की पूजा कैसे करें , गुरु से प्रार्थना कैसे करें,उनकी महिमा कैसा है? कोई भी व्यक्ति उनकी महिमा का गुणगान करते हुए अघाता क्यों नहीं है? इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। इस पद्य का पाठ किया गया है उसे सुननेे के लिए निम्नांकित वीडियो देखें।





महर्षि मेंहीं पदावली, शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित।
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P03 मंगल मूर्ति सतगुरु || प्रातःकालीन स्तुति प्रार्थना महर्षि मेंहीं पदावली भजन शब्दार्थ भावार्थ सहित P03  मंगल मूर्ति सतगुरु  ||  प्रातःकालीन स्तुति प्रार्थना  महर्षि मेंहीं पदावली भजन शब्दार्थ भावार्थ सहित Reviewed by सत्संग ध्यान on 1/08/2018 Rating: 5

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