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P79 । Introduction to Lord Shriram । जय जय राम. जय जय राम । महर्षि मेंहीं पदावली भजन अर्थ सहित

महर्षि मेंहीं पदावली  / 79   

प्रभु प्रेमियों ! संतवाणी अर्थ सहित में आज हम लोग जानेंगे- संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "महर्षि मेंहीं पदावली" जो हम संतमतानुयाइयों के लिए गुरु-गीता के समान अनमोल कृति है। इस कृति के 79वें पद्य  "जय जय राम. जय जय राम....''  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी के  बारे में। जिसे पूज्यपाद लालदास जी महाराज नेे किया है। 

इस भजन में इन प्रश्नों "Bhagwan ram history in hindi,ram ka janm kab aur kaha hua,ram kis jati ke the,ram ka janam kis yug me hua tha,bhagwan shri ram date of birth,bhagwan ram ka janam kaise hua,ram janm sthan  के उत्तर तो नहीं है लेकिन इसमें भगवान श्री राम के  short essay on lord rama in hindi, ram bhajan,shri ram ke bhajan,श्री राम गीत,जय श्री राम का गाना,श्रीराम जय श्रीराम,sri ram jaya ram,shri ram ram ki,ram dhun kirtan,jai jai ram,jai shri ram bhajan,ram keertan,shri ram ram ram,shri ram jai ram jai jai ram,shri ram jay ram jay jay ram,jai shri ram jai shri ram और अव्यक्त स्वरूप का वर्णन अवश्य है।

इस पद्य के  पहले वाले पद्य को पढ़ने के लिए 


सद्गुरु महर्षि मेंही और टीकाकार, भगवान राम के स्वरूप पर विचार विमर्श करते हुए।
भगवान श्री राम और सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस

Introduction to Lord Shriram, "जय जय राम. जय जय राम,...''
सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज जी  कहते हैं- भगवान श्री राम कैसे हैं? इस बात की जानकारी आपको पद से हो जाएगा। भगवान अव्यक्त हैं, अनादि हैं, अनंत हैं।.Introduction to Lord Shriram, "जय जय राम. जय जय राम,... इस विषय में पूरी जानकारी के लिए इस पद का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया है । उसे  पढ़ें-

।। 79 ।।

जय - जय राम , जय - जय राम , जय - जय राम कहु , जय - जय राम , जयति जयति जय राम , हो राम राम ॥१ ॥ सबमें व्यापक सब तें न्यारा , सब घट एकहि राम , हो राम राम ॥२ ॥ मेंहदी में लाली घीउ दूध में , फूल में वास समान , हो राम राम ॥३ ॥ रूप न रस नहिं , नहिं गंध परसन , नहीं शब्द नहिं नाम , हो राम राम ॥४ ॥ एक अनीह अरूप अनामा , अज अव्यक्त सो राम , हो राम राम ॥५ ॥ मन बुद्धि इन्द्रिन को गम नाहीं , आत्मगम्य सो राम , हो राम राम ॥ ६ ॥ पिंड में गुप्त ब्रह्मांड में गुप्त सो , अत्यन्त विलक्षण राम , हो राम राम ॥७ ॥ पिंड ब्रह्मांड परे प्रत्यक्ष सो , सरब परे पर धाम , हो राम राम ॥८ ॥ गुरु भगती करि गुरु गुर लहि भजि , ' में ही ' पाइय राम , हो राम राम ॥९ ॥

 शब्दार्थ -राम - सर्वव्यापी परमात्मा । ( " हो सरब निवासी राम कहासी , सबहि से न्यार हरे । " - ३५ वाँ पद्य ) जयति - जय हो । न्यारा - अलग , ऊपर , भिन्न । वास - गंध । एक अद्वितीय , अनुपम , जिसके समान कोई न हो । अनीह ( अन् + ईह ) = इच्छा - रहित , चेष्टा - रहित , उदासीन । एकहि - एक - जैसा । अनामा - अनाम , शब्दहीन , शब्दातीत । अज - अजन्मा । अरूप - रूप - रंग - विहीन , जो आँख या दिव्य दृष्टि का विषय न हो । नाम - वह वर्णात्मक शब्द जिसके द्वारा काकेई पुकारा जाता हो , शब्द । परसन स्पर्श , त्वचा ज्ञानेन्द्रिय का विषय । अव्यक्त - इन्द्रियों के लिए जो अप्रकट हो । पिंड छोटा संसार , शरीर । ब्रह्माण्ड - बड़ा संसार , बाहरी जगत् । गम - गम्य , प्राप्य , जाननेयोग्य , पहुँच , प्रवेश । आत्मगम्य - आत्मा से प्राप्त करनेयोग्य , अपने तईं जाननेयोग्य । गुप्त - छिपा हुआ , व्यापक । विलक्षण - निराला , अनूठा , विचित्र । सरब परे सबसे ऊपर । पर धाम श्रेष्ठ स्थान , सर्वोत्तम स्थान ; साकेत , वैकुण्ठ आदि धामों से ऊपर । गुर - भेद , युक्ति ; देखें- " गुरु गुर करत प्रकाश , प्रभु को प्रत्यक्ष लहै । " ( ९ ७ वाँ पद्य )

टीकाकार लाल दास जी महाराज, छोटे लाल बाबा, पूज्य पाद छोटे लाल मंडल, छोटेलाल बाबा संत नगर वाले,
टीकाकार-लालदास जीमहाराज

 भावार्थ - हे भाई ! बारम्बार ' जय - जय राम , जय - जय राम ! ' कहा करो अर्थात् . बारंबार सर्वव्यापी परमात्मा का गुणगान किया करो ।।१ ।। वह परमात्मा सभी प्रकृति - मंडलों में व्यापक है और उनसे बाहर भी अपरिमित रूप से विद्यमान है । वही एक परमात्मा सभी प्राणियों के शरीरों में भी अंशरूप से व्यापक है ।।२ ।। जिस तरह में हंदी में लाली , दूध में घी और फूलों में गंध सूक्ष्म रूप से व्यापक होती है , उसी तरह परमात्मा भी सबमें व्यापक है ॥३ ।। वह परमात्मा न तो स्थूल या सूक्ष्म दृष्टि का विषय रूप है , न जिह्वा का विषय रस ( स्वाद ) है , न नासिका का विषय गंध है , न त्वचा का विषय स्पर्श है और न कर्ण ज्ञानेन्द्रिय का विषय शब्द है । वर्णात्मक शब्दों में से कोई खास शब्द भी उसका असली नाम नहीं है ।।४ । वह परमात्मा एक - ही - एक ( अद्वितीय ) , इच्छा - रहित , रूपरंग - रहित , नाम - रहित अर्थात् शब्द - विहीन , अजन्मा और किसी भी इन्द्रिय के द्वारा जानने में आनेयोग्य नहीं है ।।५ ।। मन - बुद्धि आदि इन्द्रियों की पहुँच उस परमात्मा तक नहीं है । वह केवल चेतन आत्मा द्वारा ही पहचाननेयोग्य है ।।६ ।। अत्यन्त विचित्र वह परमात्मा अदृश्य रूप से पिंड ( शरीर ) और ब्रह्मांड ( बाहरी जगत् ) में व्यापक है ।।७ ।। पिंड और ब्रह्मांड से ऊपर उस परमात्मा का प्रत्यक्षीकरण होता है । वह सबसे ऊपर परधाम ( सर्वोत्तम स्थान - सर्वोच्च पद ) है ।।८ ।। सद्गुरु महर्षि में ही परमहंसजी महाराज कहते हैं कि गुरु की सेवा करके उनसे योग - युक्ति प्राप्त करो और उसका अभ्यास करके परमात्मा को प्राप्त कर लो ।।९ ।। टिप्पणी -१ . शरीर में जो आत्मतत्त्व है , वही बाह्य जगत् में भी व्यापक है ; दोनों में कोई तात्त्विक अन्तर नहीं है । २. सद्गुरु महर्षि में ही परमहंसजी महाराज अपनी पुस्तक ' रामचरितमानस - सार सटीक ' की चौपाई ७७ के अर्थ की टिप्पणी में लिखते हैं- " परधाम - परे स्थान सर्वोत्तम स्थान । साकेत , वैकुंठ आदि धामों और समस्त लोकों का स्थान ब्रह्मांड है । अनेकों ब्रह्मांड का स्थान प्रकृति मंडल वा माया - मंडल है और प्रकृति ( माया ) -मंडल का स्थान सर्वेश्वर है , इसलिए सर्वेश्वर परधाम है । " गो ० तुलसीदासजी ने भी परमात्मा के लिए एक , अनीह , अरूप अनाम और परधाम शब्द का प्रयोग किया है ; देखें- " एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानन्द परधामा ।। " ( रामचरितमानस , बालकांड ) ३. किसी का सच्चा नाम वह है , जो उसकी पहचान करा दे । विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों में विभिन्न शब्द परमात्मा के नाम के रूप में निर्धारित हैं ; परन्तु उनमें से कोई भी शब्द परमात्मा का असली नाम नहीं है क्योंकि उससे परमात्मा की पहचान नहीं होती । ४. जहाँ कंपन होता है , वहीं शब्द होता है । अनन्तस्वरूपी परमात्मा में कंपन नहीं होता , इसलिए वह शब्दातीत है । ५. ७ ९वें पद्य के प्रथम चरण में ४ ९ मात्राएँ हैं , ३०-११-८ पर यति और अन्त में गुरु - लघु । अन्य चरणों में ३५-३५ मात्राएँ हैं ; १६-११-८ पर यति और अन्त में गुरु - लघु । यदि प्रथम चरण के नीचे के सभी चरणों से हो राम राम ' हटा दिया जाए , तो सभी चरण सरसी छन्द के हो जाएंगे । इति।
*****

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प्रभु प्रेमियों !  "महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित" नामक पुस्तक  से इस भजन के शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी द्वारा आपने जाना कि
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P79 । Introduction to Lord Shriram । जय जय राम. जय जय राम । महर्षि मेंहीं पदावली भजन अर्थ सहित P79 । Introduction to Lord Shriram । जय जय राम. जय जय राम । महर्षि मेंहीं पदावली भजन अर्थ सहित Reviewed by सत्संग ध्यान on 6/29/2019 Rating: 5

2 टिप्‍पणियां:

  1. Pranam Baba, Jai Guru, jai prabhu shree krishn
    क्या सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज के "संत - मत" में दीक्षा लेकर गुरु महाराज के भक्ति के साथ-साथ प्रभु श्री कृष्ण का जाप कर सकते हैं, प्रभु कृष्ण का भी ध्यान कर सकते हैं क्योंकि जब से मैंने भगवद् गीता पढ़ी है तब से प्रभु कृष्ण से प्रीति हो गई है उनसे प्रेम हो गई है और मन करता है उनकी भी भक्ति करूं
    (1)भगवद् गीता :- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।
    अर्थ :- जो कोई मेरी ओर आता हैं – चाहे किसी प्रकार से हो – मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।’
    (2) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
    अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66।।
    अर्थ :- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ? मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा? तुम शोक मत करो।।
    (3) यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः।
    भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।। गीता 9/25।।
    अर्थ :- देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले मुझको ही प्राप्त होते हैं।
    Note :- क्या करें क्या ना करें मुझे बताइए बाबा मेरा मार्गदर्शन कीजिए 🙏🙏 मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप मेरे समस्याओं का समाधान कर देंगे
    🙏Jai Guru Baba🙏

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    1. जय गुरु महाराज मैं आपका टिप्पणी काफी दिनों के बाद देखा इसलिए अभी जवाब दे रहा हूं आपको अच्छी तरह से जानकारी महर्षि मेंही आश्रम कुप्पाघाट भागलपुर बिहार भारत आकर करके ही हो सकता है

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