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P109-Fruit of the guru's service-सतगुरु सेवत गुरु को सेवत-पदावली भजन अर्थ सहित

महर्षि मेंहीं पदावली / 109

प्रभु प्रेमियों ! संतवाणी अर्थ सहित में आज हम लोग जानेंगे- संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "महर्षि मेंहीं पदावली" के 109वां भजन-"सतगुरु सेवत गुरु को सेवत, मिटत सकल दुख झेला रे,....'  का पूज्यपाद स्वामी संतसेवी जी महाराज एवं पूज्य पाद लाल दास जी महाराज का किया हुआ शब्दार्थ , भावार्थ और टिप्पणी के बारे में।

महर्षि मेंहीं पदावली के इस भजन से साफ झलकता है कि गुरु सेवा का महत्व क्या है? गुरु सेवा क्या है? गुरु सेवा, गुरु सेवा का महत्व, मात पिता गुरु सेवा, गुरु मेरी पूजा, गुरु सेवा कशी करावी, गुरु सेवा ते भगत कमाई, गुरु सेवा ते भक्ति कमाई,सेवा का महत्व - साखी,गुरु सेवा की महिमा, guru ki mahima ke dohe in hindi, guru ki mahima in hindi, गुरु की सेवा सफल है,सतगुरु की सेवा सफल है, महर्षि मेंही भजन आदि बातें।

इस पद्य के  पहले वाले पद्य को पढ़ने के लिए

सद्गुरु महर्षि मेंही निवास, महर्षि मेंही आश्रम कुप्पाघाट का एक दृश्य,
सद्गुरु महर्षि मेंही निवास

सद्गुरु महिमा, गुरु सेवा का फल

       सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज कहते हैं-सद्गुरु या गुरु का सेवा करके व्यक्ति सारे दुखों से छूट जाता है। गुरु तो एक ही होते हैं। लेकिन शिष्य हज़ारों होते हैं । सभी लोग गुरु की सेवा कैसे करें?  ऐसी परिस्थिति में 'आज्ञा सम न सुसाहिब सेवा'  की सेवा सबसे महत्वपूर्ण मानी गई है ।जिसे जानने के लिए इस पद के शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी पढ़ें-

( १०९ )

सतगुरु सेवत गुरु को सेवत, मिटत सकल दुख झेला रे।टेक॥ यह दुनिया दिन चारि बसेरा , यहाँ न मेरा तेरा रे ।
मेरा तेरा दोउ यम के हाथें, पकड़ि - पकड़ि जिन घेरा रे ॥१ ॥ यह दुनिया बन्दीगृह यम के , जिव बंदी रहै घेरा रे ।
सतगुरु गुरु बिन ना कोइ कबहूँ , जो तो यम - घेरा रे ॥२ ॥ याते उठो सतगुरु गुरु हेरो , सेव करो बहुतेरा रे ।
तन मन धन आतम तिनके पद , अरपि बचो यम फेरा रे ॥३ ॥
जागृत जिन्दा सतगुरु जग में, सब जिनको कर जोड़ा रे ।
बाबा  सतगुरु देवी  साहब, जा पद को ' मेंहीं ' चेरा रे  ।।४।।

शब्दार्थ - झेला - झमेला , बखेड़ा , उलझन । दुनिया ( अरबी दुन्या ) -संसार । बसेरा - वास - स्थान , ठहरने का स्थान । मेरा - तेरा - भेद - भाव , द्वैत भाव , अपने - पराये का भाव , अहंकार , अहंकार और आसक्ति । घेरा - घेर रखा है , छेक रखा है , रोक रखा है , अटका रखा है । आतम आत्मा , अपना , हृदय । बंदी ( फा 0 ) -कैदी । बंदीगृह - बंदीखाना , कैदखाना , कारागार , जेल । घेरा - बंधन , चारो ओर से घिरा हुआ स्थान , घिरा हुआ । हेरो - खोजो । याते इससे , इसलिए । फेरा - फंदा , बंधन , चक्कर , घेरा । जागृत - जागरित , जगा हुआ , मोह - माया से ऊपर उठा हुआ , अज्ञानता से ऊपर उठा हुआ , सजग , ज्ञानी , प्रसिद्ध , प्रत्यक्ष , प्रकट । जिन्दा ( फा 0 ) -जीवित । चेरा - चेलाा, सेवक, शिष्य , दास ।

 भावार्थ - सद्गुरु की सेवा करने से संसार के सारे दुःख - झमेले मिट जाते हैं ।।टेक ॥ यह संसार दो - चार दिनों का ही बसेरा ( ठहरने का स्थान ) है ; यहाँ न मेरा कुछ है और न तुम्हारा । ' मेरा - तेरा ' ( द्वैत भाव , अपने - पराये का भाव , अहंकार और आसक्ति ) यम के दो हाथ हैं , जिनके द्वारा उसने जीवों को पकड़ - पकड़कर संसार में रोक रखा है ॥१ ॥ वस्तुत : यह संसार यम का बंदीखाना है , जिसमें जीव बंदी की तरह घिरे हुए हैं । गुरु को छोड़कर दूसरा कोई ऐसा नहीं है , जो कभी भी यम के घेरे को ( संसाररूपी बंदीखाने को ) तोड़कर बंद जीवों को मुक्त कर सके ॥२ ॥ इसलिए अब सावधान - सतर्क हो जाओ ; खोजकर सच्चे गुरु से मिलो और मन लगाकर उनकी अत्यन्त सेवा करो । अपने शरीर , मन , सम्पत्ति और आत्मा को उनके चरणों में अर्पित करके यम के फेरे ( यम के बंधन - जन्म - मरण के चक्र ) से सदा के लिए छूट जाओ ॥३ ॥ सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज कहते हैं कि बाबा देवी साहब अभी प्रत्यक्ष जीवित ज्ञानी ( अज्ञानता से ऊपर उठे हुए ) सद्गुरु हैं , संसार के सब लोगों ने जिनके महत्त्व को स्वीकारा है और मैं भी उनके चरणों का दास बना हुआ हूँ ॥४ ॥

 टिप्पणी -१ . तन , मन और धन को अर्पित करके गुरु - सेवा में संलग्न होने पर आसक्ति और अहंकार छूटते हैं । आसक्ति और अहंकार संसार के बंधन हैं । २ . ' स्वर्वेद ' नामक अपनी पुस्तक में महात्मा श्रीसदाफलदेवजी महाराज कहते हैं कि ' मैं ' और ' मेरा ' का भाव ही अहंकार है- “ हम हमार अभिमान है , भूल पड़े सब जीव । " रामचरितमानस , अरण्यकाण्ड में श्रीराम ने भी श्रीलक्ष्मणजी से कहा है कि " मैं - मेरा ' और ' तू - तेरा ' का भाव ही माया है , जिसने सब जीवों को अपने अधीन कर रखा है- “ मैं अरु मोर तोर तैं माया । जेहि बस कीन्हें जीव निकाया ॥ " ३. १०९वें पद्य में ताटंक छन्द के चरण हैं । सभी चरणों से यदि रे ' को हटा दिया जाए , तो सभी चरण सार छन्द के हो जाएंगे ।इतिि।

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प्रभु प्रेमियों ! गुरु महाराज के भारती पुस्तक "महर्षि मेंही पदावली" के इस भजन का शब्दार्थ भावार्थ का पाठ करके जाना कि   सद्गुरु या गुरु का सेवा करके व्यक्ति सारे दुखों से छूट जाता है।इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। इस वीडियो में उपर्युक्त भजन का पाठ करके सुनाया गया है।



महर्षि मेंही पदावली
महर्षि मेंहीं पदावली

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P109-Fruit of the guru's service-सतगुरु सेवत गुरु को सेवत-पदावली भजन अर्थ सहित P109-Fruit of the guru's service-सतगुरु सेवत गुरु को सेवत-पदावली भजन अर्थ सहित Reviewed by सत्संग ध्यान on 6/24/2020 Rating: 5

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