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P02 (क) सब संतन्ह की बड़ी बलिहारी || संतमत की स्तुति-प्रार्थना शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित

 महर्षि मेंहीं पदावली / 02 (क) 

     प्रभु प्रेमियों ! संतवाणी अर्थ सहित में आज हम लोग जानेंगे- संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "महर्षि मेंहीं पदावली" जो हम संतमतानुयाइयों के लिए गुरु-गीता के समान अनमोल कृति है। इस कृति के 02 रे पद्य- "सब संतन्ह की बड़ि बलिहारी,....''  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी के  बारे में। जिसे पूज्यपाद लालदास जी महाराज नेे किया है।

प्रात:कालीन ईश-स्तुति के बाद तथा अपराहन् एवं सायं कालीन स्तुति के प्रारंभ में ही इस पद्य को गाया जाता है।प्रातःकालीन स्तुति के प्रथम पद "सब क्षेत्र क्षर अपरा परा पर....'' को अर्थ सहित पढने   के लिए     👉यहाँ दवाएँ.  

संतो के साथ स्तुति प्रार्थना करते गुरु महाराज
संतो के साथ स्तुति प्रार्थना करते गुरु महाराज


Stuti-vinati of santmat satsang, "सब संतन्ह की,...''

     प्रभु प्रेमियों  ! इस संत स्तुति  (कविता, गीत, भक्ति भजन, पद्य, वाणी, छंद)  में बताया गया है- संतौं की महिमा, संतों की कथा, संत कथा, संत महात्मा की कथा, संत कौन है? कहा रहते हैं? क्या करते हैं? कैसे जीवन व्यतीत किए? इनकी वाणियां, रचना और निर्वाण कब हुआ? इन्होंने समाज का कैसे कल्याण किया? कल्याण का मूूल मंत्र, आदि बातों के साथ-साथ निम्नलिखित प्रश्नों के भी कुछ-न-कुछ समाधान पायेंगे जैसे कि सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज द्वारा किया गया संत स्तुति। Kuppa Ghat Bhagalpur, mehi bhajan,satguru bhajan, santmat bhajan, santmat sadguru bhajan,bhagalpurTop west God Bhajan,non stop Bhajan mp3,God Bhajan HD,Top west God Bhajan 2018,Top BHAJAN 2018,वायरल bhajan 2018,महर्षि मेंहीं पदावली अर्थ सहित, महर्षि मेंहीं भजन अर्थ सहित, कुप्पाघाट भागलपुरbhajan,bhajans, सत्संग bhajanअर्थ सहित, अर्थ सहित भजन आदि। इन बातोंं को समझने केेेे लिए इस पोस्ट को पूरा पढ़े.

      सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज जी  कहते हैं- "सभी संतो की बड़ी महिमा अथवा जनकल्यायाण के लिए सभी संतों का बड़ा त्याग है। इस पद्य को हमलोग रोजाना सुबह-शाम और दोपहर के सत्संग में संत-स्तुति के रूप में गाते हैं। Stuti-vinati of santmat satsang, "सब संतन्ह की,......" इस विषय में पूरी जानकारी के लिए इस भजन का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया है। उसे पढ़े-

 प्रातःसायंकालीन सन्त - स्तुति

।। मूल पद्य ।।

 सब सन्तन्ह की बड़ि बलिहारी ।
 उनकी स्तुति केहि विधि कीजै , मोरी मति अति नीच अनाड़ी ॥ सब ०॥१ ॥  दुख - भंजन भव - फंदन - गंजन , ज्ञान - ध्यान - निधि जग - उपकारी । विन्दु - ध्यान - विधि नाद - ध्यान - विधि , सरल - सरल जग में परचारी ॥ सब ०॥२ ॥ धनि ऋषि सन्तन्ह धन्य बुद्ध जी , शंकर रामानन्द धन्य अधारी । धन्य हैं साहब सन्त कबीर जी , धनि नानक गुरु महिमा भारी । सब ०॥३ ॥ गोस्वामी श्री तुलसि दास जी , तुलसी साहब अति उपकारी । दादू सुन्दर सूर श्वपच रवि , जगजीवन पलटू भयहारी ॥ सब ०॥४ ॥ सतगुरु देवी अरु जे भये हैं , होंगे सब चरणन शिर धारी । भजत है ' मेंहीं ' धन्य - धन्य कहि , गही सन्त - पद आशा सारी ॥सब ०॥५ ॥

 शब्दार्थ - बलिहारी ( बलिहार - ई ) - बलि होने का भाव , बलिदान , कुर्बानी , त्याग , महिमा , उपकार । ( बलिहार = बलि होनेवाला , जनकल्याण के लिए कष्ट उठानेवाला , दूसरों की भलाई के लिए व्यक्तिगत सुखों तथा स्वार्थ का त्याग करनेवाला । ) स्तुति - गुणगान । मति - बुद्धि । नीच - मलिन , अपवित्र , बुरा , ओछा । अनाड़ी - अज्ञानी , विचारहीन , मंद , जो तीव्र न हो । दुःख भंजन - दैहिक , दैविक और भौतिक - इन त्रय तापों को दूर करनेवाला । ( भंजन - भंग करना , तोड़ना , नष्ट करना , तोड़नेवाला , नष्ट करनेवाला ) भव - संसार , होना , जन्म , जन्म - मरण । फंदन - फंद , फंदा , जाल , बंधन , दुःख । भव - फंदन - संसार के बंधन - काम , क्रोध आदि षड् विकार , जन्म - मरणरूप बंधन , जन्म - मरण का दुःख । गंजन - नाश ; यहाँ अर्थ है - नष्ट करनेवाला । ज्ञान - ध्यान - निधि - ज्ञान - ध्यान के भंडार , ज्ञान - ध्यान में पूर्ण । ( निधि - खजाना , भंडार , समुद्र , घर , आधार । ) परचारी - प्रचार किया , प्रचार करनेवाला । धनि - धन्य , धनी , जिसके पास धन हो , जिसमें कोई गुण या विशेषता हो , ऐश्वर्यवान् , महिमावान् , स्वामी । ( ' धनी ' एक आदर , श्रेष्ठता या विशेषता - सूचक शब्द है , जो महापुरुष के नाम के आगे जोड़ा जाता है ; जैसे - धनी धर्मदासजी । ) सरल - सरल - सरलतापूर्वक , उदारतापूर्वक । धन्य - प्रशंसनीय , गुणगान करनेयोग्य । अघारी - अघारि ( अघ अरि ) , पापों के शत्रु , पापों का नाश करनेवाला । ( अघ- पाप । अरि - शत्रु , नाश करनेवाला ) साहब ( अ ० ) -स्वामी । गोस्वामी - जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया हो । ( गो - इन्द्रिय , पृथ्वी , गाय आदि ) भय - डर , अहित होने की संभावना से उत्पन्न दु:ख । ( भय कई प्रकार के होते हैं ; जैसे - अपने मरने का भय , प्रिय व्यक्ति के मरने का भय , धन - नाश का भय , प्रतिष्ठा के चले जाने का भय , स्वास्थ्य - नाश का भय , मरने के बाद मनुष्य - योनि से भिन्न योनि में जाने का भय आदि । ) हारी = हरनेवाला , नष्ट करनेवाला । शिरधारी - शिर पर धारण करनेवाला , यहाँ अर्थ है- शिर पर धारण करनेयोग्य - आदर करनयोग्य , पूजनयोग्य , प्रणाम करनयोग्य । भजत है - भजता है , भक्तिभाव से प्रणाम करता है , स्मरण करता है , नाम लेता है , गुणगान करता है , शरण लेता है , पूजा - आराधना करता है । गही - गहकर , पकड़कर । पद - चरण । आसा सारी = सारी आशाओं के साथ , पूरी आशा और भरोसे के साथ , पूरे श्रद्धा - विश्वास के साथ , हृदय के समस्त भावों के साथ । ( अन्य शब्दों की जानकारी के लिए "संतमत+मोक्ष-दर्शन का शब्दकोश" देखें ) 


भावार्थ - 
भावार्थकार- लाल दास जी महाराज
टीकाकार-लालदास
सभी संतों की बड़ी महिमा है अथवा जन - कल्याण के लिए सभी संतों का बड़ा त्याग रहा है । उनका गुणगान कैसे किया जाय - यह मैं नहीं जानता हूँ क्योंकि मेरी बुद्धि अत्यन्त मलिन और जड़ है अथवा उनका गुणगान मैं किस प्रकार करूँ , मेरो बुद्धि तो अत्यन्त मलिन और जड़ ( मंद , धीमी , विचार - होन ) है ॥१ ॥ सभी सन्त दैहिक , दैविक और भौतिक - इन तीनों तरह के दुःखों को और जन्म - मरणरूप बंधनों को भी नष्ट करनेवाले हैं । ज्ञान - ध्यान में पूर्ण ये संत संसार के लोगों की भलाई करनेवाले और विन्दु - ध्यान तथा नाद - ध्यान की सरल और सच्ची विधियों का उदारतापूर्वक सब तरह के लोगों के बीच प्रचार करनेवाले हैं ।।२ ।। चाहे प्राचीन काल के ऋषि - मुनि हों अथवा बाद के सन्त - महात्मा - सभी बड़ी महिमावाले हैं । पापों के नाश करनेवाले भगवान् बुद्ध , श्रीमदाद्य शंकराचार्य और स्वामी रामानन्दजी सदा ही गुणगान करने के योग्य हैं । सन्त कबीर साहब और गुरु नानकदेवजी भी बड़े प्रशंसनीय हैं , जिनकी बहुत महिमा बतायी जाती है ॥३ ॥ गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी , संत तुलसी साहब ( हाथरसवाले ) , दादू दयालजी , सुन्दर दासजी , सूरदासजी , श्वपचजी , रविदासजी , जगजीवन साहब और पलटू साहब - ये सब संत भी बड़े उपकारी और सब प्रकार के भय को दूर करनेवाले हैं ॥४ ॥ सद्गुरु बाबा देवी साहब और अन्य संत भी जो हो गये हैं , विद्यमान हैं और आगे होनेवाले हैं , सबके चरण शिर पर धारण करने के योग्य हैं अर्थात् सभी आदरणीय - पूजनीय हैं । सद्गुरु महर्षि में ही परमहंसजी महाराज कहते हैं कि मैं पूरी आशा और भरोसे के साथ ( पूरे श्रद्धा - विश्वास के साथ ) इन सभी सन्तों के चरणों की शरण होकर और उन्हें धन्य - धन्य कहते हुए भक्ति - भाव से उन्हें बारंबार प्रणाम करता हूँ।। ५ ।।

टिप्पणी
भगवान बुद्ध
भगवान बुद्ध
 १ . सन्तमत में भगवान बुद्ध कलियुग के आदि - संत माने जाते हैं । इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था । इनका जन्म ईस्वी सन् से ५५० वर्ष पूर्व वैशाख की पूर्णिमा को मायादेवी के गर्भ से नेपाल को तराई में कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी नामक स्थान में हुआ था । क्षत्रियवंशीय इनके पिता शुद्धोदन कपिलवस्तु के राजा थे । सिद्धार्थ का विवाह यशोधरा नाम की एक सुन्दर कन्या से हुआ था । वृद्ध , रोगी और मृतक को देखकर इन्हें वैराग्य हो गया । ये एक रात अपनी पत्नी और नवजात पुत्र राहुल को छोड़कर राजमहल से भाग निकले । घोर तपस्या के बाद इन्हें गया के एक पीपल वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई । इनका धर्म विदेशों में अधिक फैला । अस्सी वर्ष की आयु में इनका परिनिर्वाण कुशीनगर ( गोरखपुर ) में हुआ । इनका उपदेश था कि मनुष्य तृष्णा का त्याग करके दुःखों से छुटकारा पा सकता है । इनका प्रचारित धर्म ' बौद्ध धर्म ' कहलाया ।

 
आचार्य शंकर
आचार्य शंकर

२. अद्वैतवाद के प्रवर्तक आचार्य शंकर शैव थे । इनका जन्म विक्रमी संवत् ८४५ में केरल राज्य के कलादि नामक गाँव में हुआ था । इनकी माता विशिष्टा देवी और पिता शिवगुरु शिव के उपासक थे । कम ही उम्र में शंकराचार्य को अपनी मातृभाषा मलयालम और संस्कृत का भी ज्ञान हो गया था । आठ वर्ष की उम्र में इन्होंने चारो वेद पढ़ लिये । सोलह वर्ष की उम्र में पुस्तक भी लिखने लगे । कई उपनिषदों और गीता पर इनके भाष्य हैं । इनके गुरु का नाम आचार्य गोविन्द था । इन्होंने अपने समय में देश में चारों ओर फैले हुए जैन और बौद्ध मतों का खंडन करके अद्वैत मत स्थापित किया । माहिष्मती नगरी ( महिषी गाँव , जिला सहरसा , बिहार ) के मंडन मिश्र से हुआ इनका शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है । इन्होंने देश में बहुत - से मठ बनवाये । ३२ वर्ष की अल्प आयु में इनका देहान्त केदारनाथ में हुआ ।

स्वामी रामानंद
स्वामी रामानंद
३. स्वामी रामानन्द वैष्णव आचार्य थे । इन्होंने उत्तरी भारत में भक्ति - साधना का प्रचार किया । इनका जन्म कान्यकुब्ज ब्राह्मण कुल में वि . सं . १३५६ में हुआ था ; जन्म - स्थान प्रयाग बताया जाता है । रामानुज की शिष्य - परम्परा के श्रीराघवानन्दजी इनके गुरु थे । स्वामी रामानन्द की शिक्षा काशी में हुई थी और प्रायः यहीं वे रहा भी करते थे । इन्होंने जिस मत का प्रचार किया , वह रामावत या रामानन्दी सम्प्रदाय कहलाया , जिसमें भक्ति - योग का सम्यक् समन्वय हुआ है । इनके मत के साधु ' वैरागी ' कहलाते हैं । इन्होंने हिन्दी और संस्कृत में रचना की है । जाति - व्यवस्था के ये पूरे विरोधी थे । संत कबीर , संत रैदास , संत पीपा आदि इनके शिष्य थे । इनका देहान्त १११ वर्ष की आयु में हुआ । 

संत कबीर
संत कबीर
 ४. संत कबीर का जन्म काशी में विक्रम को १५ वौं शताब्दी में हुआ था । कहते हैं , ये एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पत्र हुए थे । लोक - निन्दा के भय से ब्राह्मणी ने इन्हें लहरतारा तालाब पर फेंक दिया था । नीरू नामक एक जुलाहे और उसकी पत्नी नीमा ने इनका पालन - पोषण किया । इनके गुरु स्वामी रामानन्दजी थे । कोई - कोई कहते हैं कि संत कबीर ने विवाह भी किया था ; पत्नी का नाम लोई , पुत्र का नाम
 कमाल और पुत्री का नाम कमाली था । संत कबीर कपड़ा बुनकर जीविका चलाते थे । ये निरक्षर थे , इसलिए इनके बनाये पद्य इनके साक्षर शिष्य लिपिबद्ध किया करते थे । इनकी मुख्य पुस्तक ' बीजक ' है । इनकी भाषा को विद्वानों ने सधुक्कड़ी कहा है । लगभग १०० वर्ष की आयु में इनका देहान्त मगहर में वि ० संवत् १५७५ में हुआ ।...

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P02 (क) सब संतन्ह की बड़ी बलिहारी || संतमत की स्तुति-प्रार्थना शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित P02 (क)   सब संतन्ह की बड़ी बलिहारी  ||  संतमत की स्तुति-प्रार्थना शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित Reviewed by सत्संग ध्यान on 7/09/2019 Rating: 5

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