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P138, Humility Humility Human behavior and attention "जेठ मन को हेठ करिये,.." महर्षि मेंहीं पदावली अर्थ सहित

महर्षि मेंहीं पदावली / 138

प्रभु प्रेमियों ! संतवाणी अर्थ सहित में आज हम लोग जानेंगे- संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "महर्षि मेंहीं पदावली" जो हम संतमतानुयाइयों के लिए गुरु-गीता के समान अनमोल कृति है। इस कृति के 138वां पद्य  "जेठ मन को हेठ करिये,....''  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी के  बारे में। जिसे  पूज्यपाद लालदास जी महाराज  नेे किया है।
इस Santmat चौमासा भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन,भजन कीर्तन, पद्य, वाणी, छंद) "जेठ मन को हेठ करिये,..." में बताया गया है कि- नम्रता विनम्रता मानव व्यवहार और प्रकृति की एक विशेषता है। इसका शाब्दिक अर्थ मृदुता होता है। इसे नीति परायणता, विनम्रता और धैर्य के रूप में देखा जाता है। महर्षि मेंहीं पदावली,भजन अर्थ सहित,कुप्पाघाट का भजन,भजन का अर्थ क्या है,भजन हिंदी,भजन भजन,बेस्ट भजन,भजन गीत,भक्ति भजन,भजन कीर्तन,भजन लिखना है,मीनिंग ऑफ भजन,सुगम संगीत भजन,नम्रता विनम्रता मानव व्यवहार और ध्यान,जेठ मन को हेठ करिये आदि बातें।

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नम्रता विनम्रता और ध्यान पर बात करते गुरुदेव


Humility Humility Human behavior and attention

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज जी  कहते हैं- "हे संसार में रहने वाले लोगो ! अपने मन को नम्र - कोमल , Deen - हीन बनाइये ; आदर - प्रतिष्ठा पाने की इच्छा या ख्याल तथा अहंकार छोड़ दीजिये और सद्गुरु के चरणों की सेवा करते हुए कठिनाई से पार करनेयोग्य संसार समुद्र को सरलतापूर्वक पार कर जाइये ।।...." इस विषय में पूरी जानकारी के लिए इस भजन का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया है। उसे पढ़ें--

( १३८ ) 
॥चौमासा ॥
जेठ मन को हेठ करिये , मान मद बिसराइये । 
गुरु सद्गुरु पद सेव करि करि , कठिन भव तरि जाइये ॥१ ॥ आषाढ़ गाढ़ अंधार घट में , जातें दुःख अपार है ।
गुरु - कृपा तें भेद लहि तम , तोड़ि दुःख निवारिये ॥२ ॥ 
सावन सुखमन दृष्टि आनत , दामिनि छिन - छिन दमकई । हील डोल तजि सुरत थिर करि , प्रणव तार उगाइये ॥३ ॥
भादो भव दुख छोडि चलिये , जोति छेदि पड़ाइये । 
सारशब्द में लीन होड़ कर , " मॅहीं ' गुरु - गुण गाइये ॥४ ॥ 

शब्दार्थ - हेठ करिये नीचे कीजिये , नन - कोमल बनाइये , दीन - हीन कीजिये , अहंकार - रहित कीजिये । मान - सम्मान ( आदर ) पाने की इच्छा या ख्याल । गाढ़गाढ़ा , गहन , घना । जातें जिससे , जिसके चलते , जिसके कारण । निवारिये निवारण कीजिये , रोकिये , हटाइये , दूर कीजिये , छुटकारा पाइये । आनत लाने पर , ले आने पर । दामिनि दामिनी , बिजली । दमकई - दमकती है , चमकती है । हील डोल हिलना - डोलना , काँपना , कंपकंपी । प्रणव तार - प्रणव - तारा , आज्ञाचक्रकेन्द्रविन्दु में दृष्टि - धारों के मिलकर स्थिर होने पर उदित ज्योतिर्मय विन्दु पर दिखाई पड़नेवाला एक तारा । उगाइये - उदित कीजिये , प्रकट ( प्रत्यक्ष ) कीजिये । छेदि छेदकर , भेदन करके , तोड़कर । पड़ाइये - पराइये , पलाइये , पलायन कीजिये , भाग जाइये ; देखें- “ देखि विकट भट बड़ कटकाई । जच्छ जीव लै गए पराई ॥ " ( रामचरितमानस , बालकांड ) 

भावार्थजेठ महीना - अपने मन को नम्र - कोमल , दीन - हीन बनाइये ; आदर - प्रतिष्ठा पाने की इच्छा या ख्याल तथा अहंकार छोड़ दीजिये और सद्गुरु के चरणों की सेवा करते हुए कठिनाई से पार करनेयोग्य संसार समुद्र को सरलतापूर्वक पार कर जाइये ॥१ ॥ 
आषाढ़ मास - आपके शरीर के अंदर अत्यन्त घना अंधकार छाया हुआ है , उसी के चलते आपको बहुत अधिक दुःख हो रहा है । गुरु की कृपा प्राप्त करके और उनसे योग ( दृष्टियोग ) की युक्ति जानकर शरीर के अंदर अंधकार के आवरण को तोड़ डालिये और इस तरह दुःखों से छुटकारा पा लीजिये ।।२ ।। 
सावन महीना - अपनी दोनों आँखों की दोनों दृष्टि - धारों को जोड़कर सुखमन ( आज्ञाचक्रकेन्द्रविन्दु ) में ले आने पर क्षण - क्षण चमकती हुई बिजली दिखाई पड़ती है । दृष्टियोग के विशेष अभ्यास के द्वारा अपनी दृष्टि की कँपकँपी दूर करके और सुरत को स्थिर करके प्रणव - तार उगा लीजिये ( प्रत्यक्ष कर लीजिये ) ॥३ ॥
भादो महीना - इस तरह स्थूल शरीर और स्थूल संसार के दुःखों से छुटकारा पाकर ऊपर उठिये और प्रकाश - मंडल को टपकर शब्द - मंडल में शीघ्रता से प्रवेश कर जाइये । वहाँ सारशब्द की खोज करके उसमें संलग्न हो जाइये और आदिगुरु परमात्मा की गति से अवगत हो जाइए ॥४ ॥ 

टिप्पणी - . आज्ञाचक्रकेन्द्रविन्दु में दृष्टि - धारों के मिलकर स्थिर हो जाने पर ज्योतिर्मय विन्दु उदित हो आता है और उसी पर एक तारा भी दिखाई पड़ता है । उसी तारे को ' प्रणव - तार ' या ' प्रणव - तारा ' कहा गया है । जो आज्ञाचक्रकेन्द्रविन्दु के ज्योतिर्मय विन्दु पर अथवा उस तारे पर प्रतिष्ठित हो जाता है , वह प्रणव - ध्वनि ( सारशब्द ) को पकड़ने की योग्यता हासिल कर लेता है । . सारशब्द परमात्मा से स्फुटित हुआ है और वह उससे लगा हुआ रहकर सृष्टि के अंतस्तल में अखंडित रूप से ध्वनित हो रहा है । वह परमात्मा का सच्चा चिह्न है और परमात्मा की गति से अवगत कराता है । जो सुरत उसमें संलग्न हो जाती है , वह फिर कभी भी और किसी भी हालत में उससे अलग नहीं हो पाती । सारशब्द में लगी हुई सुरत का निरंतर सारशब्द का श्रवण करते रहना आदिगुरु परमात्मा का निरंतर गुण - गान करना है । . जेठ , आषाढ़ , सावन और भादो - वर्षाकाल के इन चारो महीनों से संबंधित पद्य को ' चौमासा ' कहते हैं । बरसात में तापक्रम के बढ़ने या उमस होने पर बेचैनी का अनुभव होना , आकाश में मेघों के छा जाने पर दिन में भी अंधकार का फैल जाना , बिजली का चमकना , रात में कभी - कभी आकाश के साफ होने पर तारों का दिखाई पड़ना , सर्वत्र जल और कीचड़ हो जाने से जीवन का कष्टमय हो जाना - आदि बातें अप्रत्यक्ष रूप से १३८ वें पद्य में वर्णित हैं । . १३८ वें पद्य में अधिकांशतः गीतिका छन्द के चरण हैं ।


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प्रभु प्रेमियों !  "महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित" नामक पुस्तक  से इस भजन के शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी द्वारा आपने जाना कि नम्रता विनम्रता मानव व्यवहार और प्रकृति की एक विशेषता है। इसका शाब्दिक अर्थ मृदुता होता है। इसे नीति परायणता, विनम्रता और धैर्य के रूप में देखा जाता है इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। इस पद्य का पाठ किया गया है उसे सुननेे के लिए निम्नांकित वीडियो देखें।


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