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P140, Aarti of God in Bodylike Temple "आरति परम पुरुष की कीजै,." महर्षि मेंहीं पदावली भजन अर्थ सहित

महर्षि मेंहीं पदावली / 140

प्रभु प्रेमियों ! संतवाणी अर्थ सहित में आज हम लोग जानेंगे- संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "महर्षि मेंहीं पदावली" जो हम संतमतानुयाइयों के लिए गुरु-गीता के समान अनमोल कृति है। इस कृति के 140वां पद्य  "आरति परम पुरुष की कीजै।.....''  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी के  बारे में। जिसे  पूज्यपाद लालदास जी महाराज  नेे किया है।

इस Santmat आरती भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन,भजन कीर्तन, पद्य, वाणी, छंद) "आरति तन-मंदिर में कीजै,..." में बताया गया है कि- परम पुरुष परमात्मा की आरती ( पूजा - आराधना ) इस तरह कीजिये । शरीररूपी मंदिर में योगहृदय को सिंहासन बनाइये ; उस सिंहासन को श्वेत प्रकाशमय विन्दुओं के मोतियों से जड़कर सजाइये और तब उसपर पवित्र और स्थिर ( सिमटी हुई ) चेतनवृत्ति का या पवित्र और शान्त अन्तःकरण का आसन बिछाइये ॥१-२ ॥ महर्षि मेंहीं पदावली,भजन अर्थ सहित,कुप्पाघाट का भजन,सगुण और निर्गुण क्या है,सगुण निर्गुण हिन्दी,निर्गुण निराकार,निर्गुण और सगुण भक्ति,महर्षि मेंहीं के काव्य में ब्रह्म की आरती, ईश्वर की आरती,ईश्वर की आरती शीर्ष रिकॉर्डिंग,आरति तन-मंदिर में कीजै,ईश्वर महादेव की आरती,,ईश्वर की आरती डाउनलोड, ईश्वर स्वरूप की आरती,आरती संग्रह,आरती भजन,मेंहीं जी की आरती,भगवान की आरती,सुबह की आरती,आरती गीत,आरती सुनाइए, आदि बातें।

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Discussion on the aarti of God in the temple of body


Aarti of God in Bodylike Temple

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज जी कहते हैं- "परम पुरुष परमात्मा की आरती ( पूजा - आराधना ) इस तरह कीजिये । शरीररूपी मंदिर में योगहृदय को सिंहासन बनाइये ; उस सिंहासन को श्वेत प्रकाशमय विन्दुओं के मोतियों से जड़कर सजाइये और तब उसपर पवित्र और स्थिर ( सिमटी हुई ) चेतनवृत्ति का या पवित्र और शान्त अन्तःकरण का आसन बिछाइये ॥१-२ ॥...." इस विषय में पूरी जानकारी के लिए इस भजन का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया है। उसे पढ़ें-

( १४० )
आरति परम पुरुष की कीजै । निर्मल थिर चित आसन दीजै ॥१ ॥ तन मंदिर महँ हृदय सिंहासन । श्वेत बिन्दु मोती जड़ दीजै ॥२ ॥ अविरल अटल प्रीति को भोगा । विरह पात्र भरि आगे कीजै।।३।। जत सत संयम फूलन हारा । अरपि अरपि प्रभु को अपनीजै ॥४ ॥
धूप अकाम अरु बह्म हुताशन । तोष धूपची धरि फेरीजै ॥५ ॥
तारे चन्द्र सूर दीपावलि । अधर थार भरि आरति कीजै ।।६ ।। आतम अनुभव जोति कपूरा । मध्य आरती थाल सजीजै ॥७ ॥ अनहद परम गहागह बाजा । सार शब्द धुन सुरत मिलीजै ॥४ ॥ द्वन्द्व द्वैत भ्रम भेद विडारन । सतगुरु सेइ अस आरति कीजै ॥९ ॥ ' मे ही ' में ही आरति येही । करि - करि तन मन धन अरपीजै ॥१० ॥
ब्दार्थ- परम पुरुष - अत्यन्त श्रेष्ठ पुरुष , क्षर और अक्षर पुरुषों से जो श्रेष्ठ हो , उत्तम पुरुष , पुरुषोत्तम ( गीता १५/१८ ) , परमात्मा ; देखें- “ परम पुरुष की आरसी , साधुन की ही देह । लखा जो चाहे अलख को , इन ही में लखि लेह ॥ " ( संत कबीर साहब ) चित - चित्त , चित् , चेतनवृत्ति , चेतन आत्मा , सुरत । सिंहासन ( सिंह + आसन ) -राजा आदि श्रेष्ठ पुरुषों के बैठने की बड़ी और भव्य कुर्सी । प्राचीन काल में ऐसी कुर्सी के दायीं - बायीं ओर सिंह की आकृति बनी होती थी । ( सिंह राजा , श्रेष्ठ ) श्वेत बिन्दु - श्वेत प्रकाशमय विन्दु । अविरल ( अविरल ) -जो पतला या टूटा हुआ नहीं हो , अटूट , सघन , घना , लगातार , जो सर्वत्र एक समान हो । भोगा - भोग , भोज्य पदार्थ , नैवेद्य , देवता आदि को चढ़ायी जानेवाली भोजन की सामग्री । जत यत , यतिपन , त्याग , इन्द्रिय - संयम , अनासक्ति , वैराग्य ; देखें- “ जतु सतु संजमु साचु द्रिडाइआ , साच सबदि रसि लीणा । " ( गुरु नानकदेवजी ) संयम परहेजगारी , हानिकारक पदार्थों का उपभोग करने से बचना , विषय - सुख लेने से बचना । अपनी - अपना लीजिये , अपने अनुकूल कर लीजिये । धूप ( सं 0 ) कस्तूरी , अगर की लकड़ी आदि गंधद्रव्य जिसे जलाने से सुगंधित धुआँ उठता है । अकाम ( अ + काम ) -इच्छा - विहीन ; यहाँ अर्थ है - इच्छाविहीनता , इच्छा का न होना । ब्रह्म हुताशन - ब्रह्म - अग्नि , ब्रह्म - प्रकाश , अंत : प्रकाश । [ हुताशन ( हुत + अशन ) अग्नि । हुत - हवन किया हुआ , आहुति । अशन - भोजन , आहार । तोष - संतोष । धूपची - धूपदान , धूप जलाने का बरतन । ( ' ची ' तुर्की भाषा का एक प्रत्यय है , जिसका अर्थ है ' वाला ' ; जैसे - तोपची , अफीमची आदि ) दीपावलि ( दीप + अवलि ) -दीपों की पंक्ति , दीपों का समूह । अधर आकाश , अंतराकाश , ब्रह्मांड । आतम अनुभव - आत्मानुभव , आत्मानुभूति , आत्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान , आत्मज्ञान । जोति कपूरा - कपूर को जलाकर प्रकट की गयी ज्योति । गहागह - गहगह ( गद्गद ) , घमाघम , धूम के साथ , आनंद - भरा , मीठे स्वरवाला , मीठे स्वर में, आनंदरूप ; देखें- “ सेन विलोकि राउ हरषाने । अरू बाजे गहगहे निसाने ।। " ( रामचरितमानस , बालकांड ) " गगन नगारा बाजु गहागह , काहे रहो तुम सूती । " ( संत धरनीदासजी ) विडारन विडारनेवाला , विदारण करनेवाला , नष्ट करनेवाला । में ही महीन , सूक्ष्म , गंभीर , अलौकिक , आध्यात्मिक ।

भावार्थ - परम पुरुष परमात्मा की आरती ( पूजा - आराधना ) इस तरह कीजिये । शरीररूपी मंदिर में योगहृदय को सिंहासन बनाइये ; उस सिंहासन को श्वेत प्रकाशमय विन्दुओं के मोतियों से जड़कर सजाइये और तब उसपर पवित्र और स्थिर ( सिमटी हुई ) चेतनवृत्ति का या पवित्र और शान्त अन्तःकरण का आसन बिछाइये ॥१-२ ॥ सदा एक समान स्थिर रहनेवाले प्रेमरूपी नैवेद्य को विरहरूपी पात्र में रखकर सामने कीजिये ॥३ ॥ यतिपन , सचाई और संयमरूपी फूलों की माला बारंबार अर्पित करके परम प्रभु परमात्मा को अपने अनुकूल कर लीजिये - रिझा लीजिये ॥४ ॥ इच्छा - विहीनता की धूप और अंत : प्रकाश की अग्नि को संतोषरूपी धूपदान में रखकर उसे ( धूपदान को ) फिराइये ॥५ ॥ अंतर में दर्शित होनेवाले तारे , चन्द्र और सूर्यरूपी प्रज्वलित दीप - समूह को अंतराकाश ( रूप - ब्रह्मांड ) के थाल में रखकर आरती कीजिये ॥६ ॥ आरती के मध्य में आत्मानुभूति - रूपी कपूर की ज्योति ( कपूर को जलाकर प्रकट की गयी ज्योति ) को अंतराकाशरूपी थाल में सजाइये ॥७ ॥ अनहद नाद के साथ अत्यन्त मीठे और ऊँचे स्वर में बजनेवाले अनाहत सारशब्दरूपी बाजे की ध्वनि में सुरत को संलग्न कीजिये ॥८ ॥ द्वन्द्व द्वैत ( सुख - दुःख जैसे परस्पर विरुद्ध भावों के जोड़े ) , भ्रम ( अज्ञानता , मिथ्या ज्ञान , माया ) और भेद ( भिन्नता , अनेकता , द्वैत भाव ) को नष्ट कर डालनेवाली ऐसी आरती करने की क्षमता सद्गुरु की सेवा करके प्राप्त कीजिये ॥९ ॥ सद्गुरु महर्षि में ही परमहंसजी महाराज कहते हैं कि ऐसी सूक्ष्म ( गंभीर , अलौकिक अथवा आध्यात्मिक ) आरती बारंबार करके अपने शरीर , मन और धन को परमात्मा के प्रति निछावर कर दीजिये ॥१० ॥

टिप्पणी - . ' आरती ' शब्द संस्कृत के ' आरात्रिक ' शब्द का तद्भव रूप है । ' आरात्रिक ' का अर्थ है - रात के समय देवमूर्ति के सामने आरती उतारना , आरती उतारने का दीपक । आरती पूजन के सोलह अंगों में से एक है , जिसमें कपूर या घी के प्रज्वलित दीपक को महापुरुष या देवमूर्ति के आगे गोलाकार घुमाया जाता है । शास्त्र में पूजा के मध्य में आरती और अंत में परिक्रमा - वंदना करने का विधान है । संतों ने ' आरती ' शब्द का प्रयोग पूजा के भी अर्थ में किया है । २. सांसारिक भावों से वैराग्य होने पर परमात्मा का विरह सताने लगता है । विरह होने पर प्रेम बढ़ जाता है । परमात्मा प्रेम का भूखा है । इसीलिए विरह के पात्र में प्रेम का नैवेद्य रखकर सामने करने कहा गया है । ३. यतिपन , सचाई और संयम आदि यम - नियम के अंदर आ जाते हैं । ४. संतोष के बिना इच्छा - विहीनता नहीं आ सकती । लोभ और इच्छा ब्रह्मप्रकाश की प्राप्ति होने देने में बाधक है । संतोष के धूपदान में जब इच्छाविहीनतारूपी धूप और ब्रह्मप्रकाशरूपी अग्नि का संयोग होगा , तभी ज्ञानरूपी सुगंध उठेगी । ५ . गो ० तुलसीदासजी ने भी राम की आध्यात्मिक आरती करते हुए आत्मज्ञान को दीपक बनाया है- “ दीप निज बोधगत काम क्रोध मद मोह तम , प्रौढ़ अभिमान चित्तवृत्ति छीजै । " ( विनय - पत्रिका ) । . १४० वें पद्य का प्रथम चरण चौपाई के दो चरणों से बना हुआ है और नीचे के प्रत्येक चरण में ३२ मात्राएँ हैं ; १६-१६ पर यति और अन्त में दो गुरु वर्ण ।


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