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P141, How is god Must understand । आरति अगम अपार पुरुष की । महर्षि मेंहीं पदावली अर्थ सहित

महर्षि मेंहीं पदावली / 141

प्रभु प्रेमियों ! संतवाणी अर्थ सहित में आज हम लोग जानेंगे- संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "महर्षि मेंहीं पदावली" जो हम संतमतानुयाइयों के लिए गुरु-गीता के समान अनमोल कृति है। इस कृति के 141वां पद्य  "आरति अगम अपार पुरुष की।.....''  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी के  बारे में। जिसे  पूज्यपाद लालदास जी महाराज  नेे किया है।

इस Santmat आरती भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन,भजन कीर्तन, पद्य, वाणी, छंद) "आरति अगम अपार पुरुष की,..." में बताया गया है कि- संतवाणियों और वेद-उपनिषदों में ईश्वर के स्वरूप का जैसा वर्णन है, उसी अनुभूति युक्त बातों को सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के शब्दों में इस भजन में दर्शाया गया है।  महर्षि मेंहीं पदावली,भजन अर्थ सहित,कुप्पाघाट का भजन,आरति अगम अपार पुरुष की,महिमा अगम अपार,Aarti,'महिमा बा अगम अपार, ईश्वर कैसे हैं,क्या ईश्वर सत्य है,ईश्वर एक है,ईश्वर का स्वरूप,वेदों के अनुसार ईश्वर कौन है,ईश्वर,Ishwar,भगवान है,ईश्वर का अस्तित्व,भगवान, ईश्वर,वेदों में ईश्वर का स्वरूप, परमात्मा कौन है, आदि बातें।

इस भजन के पहले वाले पद्य को पढ़ने के लिए    यहां दबाएं


सद्गुरु महर्षि मेंहीं और टीकाकार ईश्वर-चर्चा  करते, ईश्वर कैसा है? इस पर चर्चा करते हुए गुरुदेव
सद्गुरु महर्षि मेंहीं और टीकाकार ईश्वर-चर्चा  करते

How is god Must understand

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज जी  कहते हैं- "परम पुरुष परमात्मा बुद्धि से परे , आदि - अंत - रहित ; अशुद्धता - शुद्धता और सुख - दुख से परे , शीत - उष्ण आदि द्वन्द्वों से विहीन , सबका शासक और कभी नष्ट नहीं होनेवाला है । उससे कोई भी स्थान खाली नहीं है और उसकी उत्पत्ति का कोई कारण नहीं है ।...." इस विषय में पूरी जानकारी के लिए इस भजन का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया है। उसे पढ़ें-

( १४१ ) 

आरति अगम अपार पुरुष की ।  मल निर्मल पर पर दुख सुख की ॥१ ॥ शीत उष्णादि द्वन्द्व पर प्रभु की । अविनाशी अविगत अज विभु की ॥२ ॥ मन बुधि चित पर पर अहंकार की । सर्वव्यापी और सबतें न्यार की ॥३ ॥ रूप गंध रस परस तें न्यार की । सगुण अगुण पर पार असार की ॥४ ॥ त्रैगुण दश इन्द्रिन तें पार की । अमृत ततु प्रभु परम उदार की ॥५ ॥ पुरुष प्रकृति पर परम दयाल की । ब्रह्म पर पार महाहु काल की ॥६ ॥ अति अचरज अनुपम ततु सार की । अति अगाध वरणन तें न्यार की ॥७ ॥ अकह अनाम अकाम सुपति की । जन त्राता दाता सद्गति की ॥८ ॥ अखिल विश्व मंडप करि उर की । पूर्ण भरे ता महँ प्रभु धुर की ॥९ ॥ दिव्य जोति आतम अनुभव की । दिव्य थाल अभ्यास - भजन की ॥१० ॥ असि आरति ' मे ही ' सन्तन की । करि तरि हरिय दुसह दुख तन की ॥११ ॥ 

शब्दार्थ - अगम - बुद्धि से परे । मल - विकार , दोष , अशुद्ध , अपवित्र , मलिन , विकार - युक्त , असार , जड़ प्रकृति । निर्मल - मल - रहित , दोष - रहित , विकार - रहित , शुद्ध , पवित्र , चेतन प्रकृति । अविगत ( अ + विगत ) -जिससे कोई स्थान खाली नहीं हो , सर्वव्यापक , अनिर्वचनीय , अकथनीय ; देखें- " अविगत गति कछु कहत न आवै । " ( भक्त सूरदासजी ) विभु - सर्वगत , सर्वव्यापक , सबसे बड़ा , अत्यन्त शक्तिशाली , सर्वोपरि , सर्वोपरि शासक । परस - स्पर्श , त्वचा इन्द्रिय का विषय । असार - सार - रहित , अनात्म तत्त्व , माया , जड़ और चेतन प्रकृति । अमृत ( अमृत ) -जो नाशवान् नहीं है , अविनाशी , अमर । पुरुष - चेतन प्रकृति । प्रकृति = जड़ात्मिका मूल प्रकृति । ब्रह्म - समस्त प्रकृति - मंडलों में अथवा उसके किसी भाग में व्याप्त परमात्म - अंश । ब्रह्म पर परब्रह्म , त्रिकुटी के मालिक का नाम ; देखें- " त्रिकुटी तिहु गुण मूलघर , जहँ ब्रह्म पर राजत रहैं । ( २४ वाँ पद्य ) महाकाल - काल का भी काल , परमात्मा जो महाप्रलय में सभी पिंड - ब्रह्मांडों और समस्त प्रकृति - मंडलों को अपने में विलीन कर लेता है । अति अगाध - अत्यन्त गंभीर , बुद्धि से नहीं समझनेयोग्य । अकाम - इच्छा - रहित । सुपति - सर्वश्रेष्ठ स्वामी । जन त्राता - भक्तों की रक्षा करनेवाला । सद्गति - परम गति , परम मोक्ष । मंडप - मंदिर , भवन , घर , दोवा । धुर - आदि , आरंभ । आतम अनुभव - आत्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान , आत्मज्ञान । अभ्यास भजन - भजन - अभ्यास , योगाभ्यास , ध्यानाभ्यास । दुसह - दुस्सह , असह्य , जो कठिनाई से सहा जाए ।


पूज्य बाबा स्वामी श्री लालदास जी महाराज,टीकाकार लालदास जी,टीकाकार छोटे लाल दास,
स्वामी लालदास

 भावार्थ- परम पुरुष परमात्मा बुद्धि से परे , आदि - अंत - रहित ; अशुद्धता - शुद्धता और सुख - दुख से परे , शीत - उष्ण आदि द्वन्द्वों से विहीन , सबका शासक और कभी नष्ट नहीं होनेवाला है । उससे कोई भी स्थान खाली नहीं है और उसकी उत्पत्ति का कोई कारण नहीं है । फिर , वह सर्वशक्तिमान् , मन - बुद्धि - चित्त और अहंकार - इन चारो अंतःकरणों के गति - स्थान से ऊपर , समस्त प्रकृति - मंडलों में अंशरूप से व्यापक होकर उनसे बाहर भी  अपरिमित रूप से विद्यमान , रूप - रस - गंध - शब्द और स्पर्श - इन पंच सूक्ष्म तत्त्वों अथवा इन पंच विषयों से भिन्न , सगुण ( जड़ प्रकृति - मंडल ) और निर्गुण ( चेतन प्रकृति ) से ऊपर , असार ( अनात्म ) तत्त्वों के पार , त्रय गुणों से विहीन , कर्म और ज्ञान की दस इन्द्रियों से ऊपर , परम अविनाशी तत्त्व , सबसे बड़ा दाता , पुरुष ( चेतन प्रकृति ) और प्रकृति ( जड़ात्मिका मूल प्रकृति ) से श्रेष्ठ , अत्यन्त दयालु , त्रिकुटी के मालिक ब्रह्म - पर से परे महाकाल कहलानेवाला , अत्यन्त आश्चर्यजनक , उपमा - रहित ( अद्वितीय ) , परम सारतत्त्व ( आत्मतत्त्व , परम तत्त्व ) , अत्यन्त गंभीर ( बुद्धि से बिल्कुल ही नहीं समझनेयोग्य ) , वर्णन नहीं करनेयोग्य - मुँह से कथन नहीं करनेयोग्य , शब्द - रहित , इच्छा - रहित , सर्वश्रेष्ठ स्वामी , भक्तों की रक्षा करनेवाला और परम मोक्ष देनेवाला है ॥१-८ ॥ अपने हृदय में ( शरीर के अंदर ) समस्त ब्रह्मांड को मंदिर बनाकर उसमें ( समस्त ब्रह्मांड में ) अत्यन्त सघनता से आंशिक रूप से व्यापक ऐसे आदितत्त्व परमात्मा की आरती इस प्रकार कीजिये ॥९ ॥ आत्मज्ञान को अलौकिक प्रकाश ( अलौकिक प्रज्वलित दीपक ) और भजन - अभ्यास ( योगाभ्यास- ध्यानाभ्यास ) को अलौकिक थाल बनाइये ॥१० ॥ सद्गुरु महर्षि में ही परमहंसजी महाराज कहते हैं कि आरती करने की ऐसी आध्यात्मिक विधि संतों की है । सभी लोग ऐसी आरती करके उद्धार पा लीजिये और शरीर में आबद्ध होने के कारण जो दुस्सह दुःख हो रहा है , उसको मिटा डालिये ॥११ ॥

टिप्पणी -१ . ' महाकाल ' का अर्थ है - जो काल ( समय ) का भी काल ( विनाशक ) हो । प्रकृति के बनने पर ही देश - काल होते हैं । महाप्रलय के समय जब परमात्मा समस्त प्रकृति - मंडलों को अपने में विलीन कर लेता है , तब देश के साथ काल भी विनष्ट हो जाता है । काल का विनाशक होने के कारण परमात्मा ' महाकाल ' कहलाता है । २. दृष्टियोग की पूर्णता होने पर साधक अंतर्मुख हो जाता है और तभी उसके द्वारा प्रभु की सच्ची उपासना ( भक्ति ) शुरू होती है । अपने शरीर के अंदर प्रभु की आराधना के लिए अखिल विश्व को वही मंदिर बना सकेगा , जो दृष्टियोग की साधना करेगा ; क्योंकि दृष्टियोग का साधक ही अपने शरीर के अंदर अखिल विश्व को देख पाता है- “ सकल दृश्य निज उदर मेलि , सोवइ निद्रा तजि योगी । " ( गो 0 तुलसीदासजी , विनय - पत्रिका ) ३. पदावली में कई स्थलों पर परमात्मा अत्यन्त आश्चर्यजनक बताया गया है । जो परमात्मा को सबसे बड़ा आश्चर्य मानेगा , वही उसका रहस्य जानना चाहेगा । जो भौतिक जगत् को रहस्यमय समझेगा , वह उसी के रहस्य को जानना चाहेगा । परमात्मा का रहस्य जानने पर भौतिक जगत् का रहस्य अपने - आप खुल जाता है । ४. १४१ वें पद्य में चौपाई के चरण हैं । 


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प्रभु प्रेमियों !  "महर्षि मेंहीं पदावली शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी सहित" नामक पुस्तक  से इस भजन के शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी द्वारा आपने जाना कि संतवाणियों और वेद-उपनिषदों में ईश्वर के स्वरूप का कैसा है? इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। इस पद्य का पाठ किया गया है उसे सुननेे के लिए निम्नांकित वीडियो देखें।



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