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P142, Whom to perform Aarti? "अज अद्वैत पूरण ब्रह्म पर की।..." महर्षि मेंहीं पदावली भजन अर्थ सहित

महर्षि मेंहीं पदावली / 142

प्रभु प्रेमियों ! संतवाणी अर्थ सहित में आज हम लोग जानेंगे- संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "महर्षि मेंहीं पदावली" जो हम संतमतानुयाइयों के लिए गुरु-गीता के समान अनमोल कृति है। इस कृति के 142वां पद्य  "अज अद्वैत पूरण ब्रह्म पर की।.....''  का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी के  बारे में। जिसे  पूज्यपाद लालदास जी महाराज  नेे किया है।

इस Santmat आरती भजन (कविता, गीत, भक्ति भजन,भजन कीर्तन, पद्य, वाणी, छंद) "अज अद्वैत पूरण ब्रह्म पर की,..." में बताया गया है कि- भक्तों के कष्टों को दूर करनेवाला , अजन्मा , अद्वितीय और पूर्ण ब्रह्म से बढ़कर जो परमात्मा है , उसकी आरती कीजिये ।  क्या है आरती का विधान और महत्व?इनकी पूजा करेंगे तो पछताएंगे,देवी देवताओं की आरती,आरती,आरती का महत्व,आरती का सही समय,आरती के प्रकार,आरती कैसे करें,आरती कितनी बार घुमानी चाहिए,पंच देव आरती,आरती करना,आरती क्रम,आरती सामग्री,आरती संग्रह पुस्तक,कपूर की आरती,शयन आरती,वेदों में ईश्वर का स्वरूप, परमात्मा कौन है, आदि बातें।

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Whom to perform Aarti?

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज जी  कहते हैं- "भक्तों के कष्टों को दूर करनेवाला , अजन्मा , अद्वितीय और पूर्ण ब्रह्म से बढ़कर जो परमात्मा है , उसकी आरती कीजिये ।।१ ।।...." इस विषय में पूरी जानकारी के लिए इस भजन का शब्दार्थ, भावार्थ और टिप्पणी किया गया है। उसे पढ़ें-

( १४२ )
अज़ अद्वैत पूरण ब्रह्म पर की । आरति कीजै आरत हर की ॥१ ॥ अखिल विश्व भरपुर अरु न्यारो । कछु नहिं रंग न रेख अकारो ॥२ ॥ घट घट बिन्दु बिन्दु प्रति पूरन । अति असीम नजदीक न दूर न ॥३ ॥ वाष्पिय तरल कठिनहू नाहीं । चिन्मय पर अचरज सब ठाहीं ।।४ ।। अति अलोल अलौकिक एक सम । नहिं विशेष नहिं होवत कछु कम ॥५ ॥ नहिं शब्द तेज नहिं अँधियारा । स्वसंवेद्य अक्षर क्षर न्यारा ॥६ ॥ व्यक्त अव्यक्त कछु कहि नहिं जाई । बुधि अरु तर्क न पहुँचि सकाई ॥७ ॥ अगम अगाधि महिमा अवगाहा । कहन में नाहीं कहिये काहा ॥८ ॥ करै न कछु कछु होय न ता बिन । सबको सत्ता कहे अनुभव जिन ॥९ ॥ घट - घट सो प्रभु प्रेम सरूपा । सबको प्रीतम सबको दीपा ॥१० ॥ सोइ अमृत ततु अछय अकारा । घट कपाट खोलि पाइय प्यारा ॥११ ॥ दृष्टि की कुंजी सुष्मन द्वारा । तम कपाट तीसर तिल तारा ।।१२ ।। खोलिय चमकि उठे ध्रुव तारा । थाल भरपूर उजेरा ॥१३ ॥ दामिनि मोती झालरि लागी । सजै विरही वैरागी ॥१४ ॥ स्याही सुरख रंगा । जरद जंगाली को करि संगा ॥१५ ॥ ये रंग शोभा थाल बढ़ावै । सतगुरु सेड़ - सेड़ भक्तन पावै ॥१६ ॥ अचरज दीप शिखा की जोती । जगमग जगमग थाल में होती ।।१७ ।। असंख्य अलौकिक नखतहु तामें । चन्द औ सूर्य अलौकिक वामें ॥१८ ॥ अस ले थाल बजाइय अनहद । सारशब्द हो हदहद ॥१९ ॥ शम दम धूप कर अति सौरभ । पुष्प माल हो यम नीयम सभ ॥२० ॥ अविरल भक्ति की प्रीति प्रसादा । भोग लगाइय अति मर्यादा ॥२१ ॥ प्रभु की आरति या विधि कीजै । स्वसंवेद्य आतम पद लीजै ॥२२ ॥ अकह लोक आतम पद सोई । पहुँचि बहुरि आगमन न होई ॥२३ ॥ सन्तन कीन्हीं आरति एही । करै न परै बहुरि भव ‘ में ही ' ॥२४ ॥ 

शब्दार्थ - अद्वैत द्वैत - हीन , जो अनेक नहीं हो , जो एक ही - एक हो , बेजोड़ , अद्वितीय , उपमा रहित । पूरण ब्रह्म पूर्ण ब्रह्म , समस्त प्रकृति - मंडलों में व्यापक परमात्म अंश । आरत - आर्त्त , दुःखी , पीडितः यहाँ अर्थ है -- आर्ति , दुःख , पीड़ा , कष्ट । रेख - रेखा , चिह्न । अकारी - आकार , आकृति । बिन्दु विन्दु - प्रत्येक विन्दु में , प्रत्येक परमाणु में । अति असीम- अत्यन्त सीमा - रहित , सब तरह से अनादि । नजदीक ( फा ० ) - पास , निकट , समीप । वाष्यिय - वाष्पीय , गैसीय , भाप या गैस जैसा । तरल - जल की तरह निचाई की और बहनेवाला पदार्थ , द्रव । कठिनहू - कठिन भी , ठोस पदार्थ भी । चिन्मय ( चित् + मय ) ज्ञानमय , चेतन तत्त्व , परा प्रकृति , चेतन प्रकृति । पर - श्रेष्ठ । अलोल ( अ - लोल ) = अडोल , अकम्प , जो चलायमान नहीं हो , जो परिवर्तनशील नहीं हो , अविनाशी , स्थिर : देखें- " उपजा ज्ञान बचन तब बोला । नाथ कृपा मन भयउ अलोला ।। " ( रामचरितमानस , किष्किधाकांड ) एक सम - सर्वत्र एक समान - एकरूप रहनेवाला । कम ( फारसी ) -थोड़ा । तेज - प्रकाश । स्वसंवेद्य - अपने से जाननेयोग्य , अपने से ज्ञात होनेयोग्य , आत्मा से अनुभव करनेयोग्य । व्यक्त जो इन्द्रियों के ग्रहण में आवे । अव्यक्त जो इन्द्रिय के ग्रहण में नहीं आवे । तर्क - बुद्धि - सम्मत विचार , न्याय संगत विचार , उपयुक्त विचार , कल्पना , अनुमान । अवगाहा अवगाह , अगाध , गंभीर । सत्ता अस्तित्व । प्रेम सरूपा - प्रेमस्वरूप , प्रेमपूर्ण , प्रेममय । प्रीतम प्रियतम , अत्यन्त प्यारा , स्वामी । दीपा - प्रकाशित करनेवाला , प्रकट करनेवाला , उत्पन्न करनेवाला,  प्रकाश देनेवाला । अमृत ततु - अविनाशी तत्त्व । अकारा - आकार , स्वरूप । सुष्मन - सुखमन , आज्ञाचक्र । तीसर तिल - तीसरा तिल , आज्ञाचक्रकेन्द्रविन्दु । तारा - ताला । उजेरा - उजाला , प्रकाश । दामिनि दामिनी , बिजली । झालरि - झालर । विरही - जिसे किसी से अलग होने का दुःख हो रहा हो । वैरागी जो सांसारिक सुखों से अलग रहता हो । स्याही ( फा ० ) कालापन ; यहाँ अर्थ है - स्याह , काला । सुरखा सुर्खा ( फा ० ) , लाल । सफदी - उजलापन : यहाँ अर्थ है - सफेद , सुफैद ( फा ० ) , उजला । जरद जर्द ( फा ० ) , पौला । जंगाली - जंगारी ( फा ० ) , जंगार के रंग का , नोले रंग का ; यहाँ अर्थ है - नीला । ( जंगार तूतिया को भी कहते हैं । कोई - कोई जंगाली का अर्थ नीला और काई - कोई हरा बतलाते हैं । ) दीप - शिखा - दीए की टेम , चिराग की लौ । जगमग जगमग - सतत प्रकाशमान । नखतहु - नक्षत्र भी , तारे भी । हदहद - हद से ज्यादा , सीमा से अधिक , बहुत ही अधिक , अपार । ( हद अरबी शब्द है , जिसका अर्थ है - सीमा । ) शम - मनोनिग्रह । दम - इन्द्रिय निग्रह । सौरभ - सुगंध । पुष्प माल फूलों की माला । यम - सत्य , अहिंसा , अस्तेय , ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । नियम - शोच , संतोष , तप , स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान । अविरल - घना , प्रगाढ़ , अटूट , लगातार , निरंतर एक समान रहनेवाला । प्रसादा - प्रसाद , देवता के प्रति अर्पित किया जानेवाला खाद्य पदार्थ या देवमूर्ति के आगे रखा जानेवाला खाद्य पदार्थ । भोग लगाइय - नैवेद्य रखिये , नैवेद्य अर्पित कीजिये । मर्यादा आदर । अकह लोक अकथनीय पद , शब्दातीत पद , आत्मपद , परमात्मपद । बहुरि - पुनः , लौटकर ।

 भावार्थ - भक्तों के कष्टों को दूर करनेवाला , अजन्मा , अद्वितीय और पूर्ण ब्रह्म से बढ़कर जो परमात्मा है , उसकी आरती कीजिये ।।१ ।। वह परमात्मा समस्त ब्रह्मांडों में समान रूप से व्यापक है और उनके बाहर भी विद्यमान है । उसके न कोई रंग है , न बाहरी जगत् में कोई चिह्न और न आकृति हो ।।२ ।। वह प्रत्येक शरीर में और सृष्टि के परमाणु - परमाणु में भरा हुआ है । वह सब तरह से अनादि है ; उस न समीप कह सकते हैं , न दूर ही ।।३ ।। वह न तो गैस - जैसा है , न तरल - जैसा और न टोस पदार्थ - जैसा ही । वह ज्ञानमयी प्रकृति ( चेतन प्रकृति ) से श्रेष्ठ , अत्यन्त आश्चर्यजनक और सब स्थानों में व्यापक है ।।४ ।। वह अत्यन्त स्थिर , परम अलौकिक और सर्वत्र एक ढंग का होकर रहनेवाला है । उसके बारे में ऐसा नहीं समझना चाहिये कि वह कहीं विशेष होकर है और कहीं कुछ कम होकर ।।५ ।। वह न तो अंधकार है , न प्रकाश और न शब्द ही । अपनी आत्मा से अनुभव करनेयोग्य वह परमात्मा क्षर ( जड़ प्रकृतिमंडल ) और अक्षर ( चेतन प्रकृति ) -दोनों से ऊपर है ।।६ ।। वह व्यक्त ( इन्द्रिय - ग्राहा ) या अव्यक्त ( इन्द्रिय - अग्राहा ) ; कुछ भी नहीं कहा जा सकता । बुद्धि और कल्पना ( विचार , अनुमान ) उसके स्वरूप तक पहुँच नहीं सकती ।।७ ।। वह बुद्धिपद से परे है और उसकी महिमा समझ में नहीं आनेयोग्य है । वह परमात्मा वर्णन में आनेयोग्य नहीं है , इसलिए उसके बारे में क्या कहा जा सकता है अर्थात् कुछ नहीं कहा जा सकता है ।।८ ।। वह कुछ भी नहीं करता है , फिर भी उसके बिना कुछ होता भी नहीं है । जिनको इसका अनुभव हुआ है , वे कहते हैं कि वह सबके अस्तित्व का मूलकारण है ।।९ ।। यह परमात्मा प्रसस्वरूप होकर सब शरीरों में व्यापक है । सबका स्वामी वही है और वही सबको प्रकाशित करनेवाला अर्थात् उत्पन्न करनेवाला है ।।१० ॥ वही अमृत तत्त्व अविनाशी स्वरूपवाला है । शरीर के अंदर के आवरणों को हटाकर उस परम प्रिय परमात्मा को प्राप्त कर लीजिये ॥११ ॥ ज्योतिमंडलरूपी कोठरी के आज्ञाचक्ररूपी द्वार पर अंधकाररूपी मजबूत कियाड लगा हुआ है । उस किवाड़ के बीच में आज्ञाचक्रकेन्द्रविन्दुरूपी ताला है । सिमटी हुई दृष्टिरूपी चाबी से उस ताले को खोलिये , तो ध्रुवतारा प्रकाशमान होकर उदित हो आएगा और सूक्ष्म आकाशरूपी धाल प्रकाश से परिपूर्ण हो जाएगा ।।१२-१३ ।। परमात्मा के विरह में दुःखी और सांसारिक सुखों से अलग रहनेवाला साधक अंदर में दिखाई पड़नेवाली बिजली और मोती के प्रकाश को सूक्ष्म आकाशरूपी थाल में झालर के रूप में सजाता है ।।१४ ।। पीला , लाल , काला , नीला और उजला - ये पाँच रंग थाल की शोभा बढ़ाते हैं । सद्गुरु की सेवा करते रहनेवाले भक्त ही ऐसी आरती कर पाते हैं ।।१५-१६ ।। सूक्ष्म आकाशरूपी थाल में दीपक - लौ - जैसी अद्भुत ज्योति सदा जगमगाती रहती है ।।१७ ।। उस थाल में और भी अनगिनत अलौकिक तारों , चंद्रमा और सूर्यरूपी दीप - समूह को रखकर अनहद नादों और आश्चर्यजनक अपार सारशब्द के बाजों को बजाइये ।।१८-१९ ।। इस आध्यात्मिक आरती में इन्द्रिय - निग्रह तथा मनोनिग्रह की धूप बहुत अधिक सुगंध फैलाती है और यम - नियम के अंगों के फूलों की माला होती है ।।२० ।। अत्यन्त आदर के साथ सदा एक समान रहनेवाली भक्ति और प्रेम का प्रसाद ( नैवेद्य ) अर्पित कीजिये ।।२१ ।। इसी विधि से परमात्मा की आरती ( पूजा ) कीजिये और अपने तई अनुभव करनेयोग्य आत्मपद को प्राप्त कर लीजिये ॥२२ ।। अकह लोक ( शब्दातीत पद ) ही आत्मपद कहलाता है , जहाँ पहुँच जाने पर पुनः संसार में लौटना नहीं पड़ता ।।२३ ।। सद्गुरु महर्षि में ही परमहंसजी महाराज कहते हैं कि संतों ने ऐसी ही आरती की है और जो भी ऐसी आरती करेगा , वह फिर जन्म - मरण के चक्र में नहीं पड़ेगा ॥२४ ॥

 टिप्पणी -१ . परमात्मा देश - काल और उत्पत्ति ( स्थिति ) की दृष्टि से भी अनादि है । २. व्यक्त - अव्यक्त सापेक्ष शब्द हैं , इनमें से किसी के भी द्वारा सृष्टि के पूर्व से विद्यमान अद्वितीय परमात्मा को निर्दिष्ट करना उचित नहीं । इसी तरह सृष्टि होने पर ही किसी पदार्थ को समीप और किसी पदार्थ को दूर कह सकते हैं । सृष्टि के पहले से विद्यमान अद्वितीय परमात्मा को न दूर कह सकते हैं , न समीप ही । व्यक्त - अव्यक्त , क्षर - अक्षर , अंधकार प्रकाश आदि द्वन्द्व सृष्टि होने पर ही हो सकते हैं । ३. सारशब्द बड़ी आश्चर्यजनक और विलक्षण महाध्वनि है ; क्योंकि उसीसे सृष्टि का होना बताया जाता है । ४. १४२ वं पद्य में चौपाई के चरण हैं ।

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